1857 की स्वतंत्रता संग्राम और देवबंद के उलमा की भूमिका

1857 की स्वतंत्रता संग्राम और देवबंद के उलमा की भूमिका

1857 की स्वतंत्रता संग्राम और देवबंद के उलमा की भूमिका 1857 Freedom Struggle and Role of Ulama of Deoband


भारत में अंग्रेजों का आगमन और कब्जा  

आप ईश्वर का इनकार भी कर बैठो, मुहम्मद का भी, लेकिन  

जांबाज तमाशा देखेंगे कयामत में नाफ़रमानों का  

कलम और जुबान से निकले शब्द इतिहास को जन्म देते हैं। जब राष्ट्र अधिकारों की मेज पर आमने-सामने बैठते हैं, तो वहां वोट नहीं, लाशें गिनी जाती हैं। जिस राष्ट्र की लाशें अपने अधिकारों की प्राप्ति में ज्यादा होंगी, वही हर ओवल दस्ता कहलाएगी। भारत में फिरंगी साम्राज्य के खिलाफ आजादी की लड़ाई में पहल मुसलमानों ने की। अंग्रेजों के खिलाफ सैन्य युद्ध लड़ा तो मुसलमानों ने। तोपों के मुंह से बांधकर उड़ाए गए तो मुसलमान। फांसी के तख्ते पर इंकलाब जिंदाबाद कहा तो मुसलमानों ने। अंडमान द्वीप को बसाया तो अंग्रेजों के बागी मुसलमानों ने।


ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना

बीते जमाने का यह मुहावरा है कि ज़न, ज़मीन और ज़र बुनियाद फसाद हैं। पूंजीपति चाहे किसी रंग-रूप का हो, हमेशा अपने फायदे की सोचता है। किस्सा असल में ऐसे शुरू हुआ कि हॉलैंड के सौदागरों ने एक पाउंड गर्म मसाले की कीमत में पांच शिलिंग का इजाफा कर दिया। तो लंदन के दो दर्जन व्यापारी सीख पा गए। उन्होंने एक व्यापारिक कंपनी बनाने का फैसला किया। इस कंपनी का नाम ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी (ब्रिटेन) रखा गया। मलिका एलिजाबेथ ने ईस्ट इंडिया कंपनी को शाही परवाना अता किया। इसके बाद कंपनी के सदस्यों ने समुद्री सफर के जरिए अलग-अलग मकाम पर अपने कारोबारी अंदाज और तरीके से खुद को मुनज़्ज़म करना शुरू किया। चुनांचे सबसे पहली बार कप्तान विलियम हॉकिन्स एक जहाज के जरिए सूरत की बंदरगाह में दाखिल हुआ और भारत में आ पहुंचा। 1415 हिजरी या 1608 ईस्वी में सर टॉमस रो जहांगीर के दरबार में हाजिर हुआ और एक दरख्वास्त के जरिए शहंशाह से कारोबारी रियायतें हासिल कर लीं और साथ ही उसे सूरत इलाके में एक कोठी बनाने की इजाजत भी मिल गई। यह वह घड़ी है जब व्यापार के बहाने अंग्रेजों के नापाक कदम भारत में आए। यह कदम फिर ऐसे जमे कि तीन सौ साल तक इस मुल्क की सारी बहारें गैर-मुल्की लूटते रहे और जब यह रुखसत हुए तो सारा हिन्दुस्तान खजान की ऐसी जद में था कि फिर इस पर कभी बहार न आई। गैर-मुल्की सौदागरों ने आहिस्ता-आहिस्ता अपने पांव हिन्दुस्तान में फैलाने शुरू किए। आज यहां, कल वहां, परसों जरा आगे। पहले सूरत में कोठी बनाई, फिर बड़ौदा, फिर आगरा, फिर दरिया-ए-हुगली पार करके कोलकाता को अपना मर्कज़ मुकर्रर कर लिया। "आग लेने आई, घर की मालिक बन बैठी।" मुग़ल सल्तनत के ज़वाल में रियाया को मुजरिम करार नहीं दिया जा सकता, बल्कि यह घर अपने ही चिरागों से जलकर राख हो गया। मुसलमान बादशाह, जिन्हें करीबन हजार साल हिन्दुस्तान में इस्तेहकाम हासिल रहा, जब सर-ए-निगूं हुआ तो उसकी फर्द-ए-जुर्म पर गैरों के दस्तखत नहीं थे, बल्कि अपना ही खून था जो महलात की अंदरूनी रकाबतों और साजिशों से उसे बहाकर ले गया। जो क़ौम मुग़ल शहंशाहों के आस्तानों पर तिजारत की भीख मांगने आती थी, जब वे आस्ताने उजड़ गए, जब भीख देने वाले हाथ खुद मुहताज हो गए और लाल किले के बाशी शाहजहां की मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर भीख मांगने लग पड़े तो फिर गैर-मुल्की ताजिरों ने अपने भंडार खोल दिए। जैसे-जैसे उनके कदम बढ़ते गए, हिन्दुस्तान की आज़ादी सिमटकर उनके कदमों में ढेर होती गई।

1857 की स्वतंत्रता संग्राम और देवबंद के उलमा की भूमिका 1857 Freedom Struggle and Role of Ulama of Deoband


औरंगजेब आलमगीर की वफात

औरंगजेब आलमगीर की वफात के बाद हिन्दुस्तान के मुख़्तलिफ इलाकों में छोटी-छोटी रियासतें कायम हुईं। इसी अबतरी के दौर में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पांव फैलाने शुरू कर दिए। उनके साथ दूसरी कारोबारी कौमें भी हुसूल-ए-इक़तिदार में हाथ-पांव मारने लगीं। यहां तक कि मुल्क के मुख़्तलिफ हिस्सों में सूबा-ए-खुदमुख्तारी के इलानात होने लगे। इस इफरात-तफरीती से फायदा उठाते हुए कंपनी ने नवाबों और राजाओं से गठजोड़ शुरू कर दिए। आलमगीर ने मुरशिद कुली खां को बंगाल का नवाब-ए-नाज़िम मुकर्रर किया हुआ था, मगर आलमगीर की मौत के बाद यही सूबेदार अमली तौर पर फरमानरवा बन बैठा। अभी पूरी तरह संभला न था कि बिहार के हाकिम अलीवर्दी खां ने बंगाल को फतह कर लिया। यह उस इलाके के लिए बेहतरीन हाकिम साबित हुआ। 1756 में अलीवर्दी खां का इंतिक़ाल हो गया। इसकी इनान-ए-इक़तिदार इसके नवासे सिराजुद्दौला ने संभाल ली। मरने से पहले सिराजुद्दौला को वसीयत की कि मगरबी अक़्वाम की उस क़ूव्वत को हमेशा पेश-ए-नज़र रखना जो उन्हें हिन्दुस्तान में हासिल हो चुकी है। सिराजुद्दौला अपने ख़ानदान में अनगिनत सलाहियतों का मालिक था, लेकिन तख्त संभालते ही उसे पहले अपने ख़ानदान से निपटना पड़ा। अपनी चाची बेगम घसीटी और चचेरे भाई शौकत जंग से आज़मा हुआ। अंदरून-ए-खाना मार-ए-आस्तीन (दोस्त-नुमा दुश्मन) बने हुए थे। उन्हें ठिकाने लगाया तो असल दुश्मन का पता चला कि अंदर-ए-खाने यह सारी गेम तो अंग्रेज खेल रहे हैं। इस दौरान अंग्रेजों ने कोलकाता में तामीर करवाया अपना किला फोर्ट विलियम को मज़बूत करना शुरू कर दिया। नवाब ने अंग्रेजों से किले की वापसी का मुतालबा किया तो उन्होंने इन्कार कर दिया। इस पर सिराजुद्दौला ने गुस्से में आकर अंग्रेजों पर हमला करके कोलकाता उनसे छीन लिया।


सिराजुद्दौला की शहादत, अंग्रेज का पहला बागी मुसलमान

लेकिन इस कामयाबी की उम्र दीर्घकालिक साबित न हुई। जैसे ही मद्रास में यह खबर पहुंची कि कोलकाता अंग्रेजों से छिन गया है, इसके साथ ही अंग्रेजी अफवाज के सिपहसालार क्लाइव ने मद्रास से कोलकाता पहुंचकर खुफिया तौर पर नवाब की फौज के सिपहसालार मीर जाफर से एक खुफिया मुआहिदा तय किया।


जंग-ए-पलासी

मजकूर-ए-बाला साजिशी मुआहिदे के बाद 23 जून 1757 को नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेज के दरमियान पलासी के मैदान में जंग हुई। इस मौके पर मीर जाफर ने ग़द्दारी की कि अपनी फौजों को अयन वक्त पर मैदान में जाने से रोक दिया। 29 जून 1757 को इन्हीं के अहलकारों की साजिश और सिपहसालार मीर जाफर की ग़द्दारी से अंग्रेजों के इस बहुत बड़े दुश्मन को शहीद कर दिया गया। इस कामयाबी ने बंगाल को मुकम्मल तौर पर अंग्रेजों के हाथ में दे दिया। इस जंग की कामयाबी ने कंपनी के खास तिजारती दौर का खातमा किया और एक वसीओ ख़ित्ता-ए-मुल्क हाथ आ जाने से तिजारत के साथ हुकूमत का दौर शुरू हुआ। अंग्रेजों के मुकाबले में यह मुसलमानों की पहली शिकस्त थी। इस शिकस्त से हिन्दुस्तान का एक बड़ा मोर्चा खत्म हो गया।


रुहेलखंड का नवाब हाफिज़ रहमत खां

रुहेलखंड का इलाका अवध के उत्तर-पश्चिम में एक खुशहाल और सरसब्ज इलाका था। यहां रुहेलों की मुख्तसर एक मख्सूस रियासत थी। हाफिज़ रहमत खां इस कबीले का सरदार था। वह पांच हजार उलमा-ए-किराम को मुल्की खज़ाने से वज़ीफ़े और तनख्वाहें देता था। तुलबा के इख़राजात की खुद-कफालत करता था। इसने देहात और कस्बात में मस्जिदें बनवाईं और उनमें बाकायदा ख़तीब और ख़ादिम मुकर्रर किए। औरंगजेब आलमगीर की वफात के बाद हिन्दुस्तान के मुख़्तलिफ इलाकों में जो छोटी-छोटी रियासतें कायम हुईं, रुहेलखंड की रियासत उन्हीं में शुमार होती थी। नवाब वज़ीर खान वाली-ए-अवध से मिलकर अंग्रेज ने हाफिज़ रहमत खां से जंग की। इस लड़ाई में तीस हजार के करीब रुहेले मारे गए। उनके अलावा हाफिज़ रहमत खां और उनके तीनों बेटे भी इस मैदान में काम आए। इस शहर यानी बरेली पर अंग्रेज का तसल्लुत हो गया।


ग़द्दारी का अन्जाम

इस्लाम की इज्तिमाई ज़िंदगी में शहीद और ग़द्दार दो लफ्ज़ इस क़दर वज़न रखते हैं कि उनका इन्कार मुसलमानों के लिए ख़ासियत से नावाजिब करार दिया गया है। लेकिन रवां दौर में यह अल्फाज कमो-बेश अपना वक़ार खो चुके हैं। एक बदमाश दूसरे बदक़िस्मत को क़त्ल कर दे तो मक़तूल के हमनवा उसे शहीद का दर्जा दे देते हैं। किसी की बहू-बेटी के अग़वा में कोई मारा जाए तो उसके वारिस भी मरने वाले को शहीद कहकर पुकारने लगते हैं। अगर दो जुआरी बाहम रकाबत में लड़कर मारे जाएं तो उनके मानने वाले उन्हें भी शहीद-फी-सबीलिल्लाह कहते हैं। इसी तरह लफ्ज ग़द्दार भी मज़ाक बनकर रह गया है और हलकेपन का यह आलम है कि महज़ राय से इख्तिलाफ की बुनियाद पर ग़द्दार का ख़िताब दे दिया जाता है। ग़द्दार चाहे किसी भी लिबास में हो, जब अपने अन्जाम को पहुंचता है तो क़ौमों के मुस्तकबिल में इबरत का निशान छोड़ जाता है। चुनांचे मीर जाफर ने सिराजुद्दौला और वतन-ए-अज़ीज़ से जो ग़द्दारी की, उसके अंग्रेज आकाओं ने उसे बहुत जल्द इसकी सज़ा दे दी कि उसे ना-अहल करार देकर उसकी जगह उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल का नवाब मुकर्रर कर दिया। मीर कासिम ने बरसर-ए-इक़तिदार आकर मेदिनीपुर और चटगांव के इज़ाफ़े कंपनी बहादुर यानी अंग्रेजों के हवाले कर दिए और वह बग़ैर महसूल अदा किए ज़ाती तौर पर तिजारत करने लगे। हुकूमत को आमदनी में ख़सारा होने लगा, जिस पर अवध के नवाब शुजाउद्दौला और शहंशाह शाह आलम सानी की मदद से मीर कासिम ने अंग्रेजों से जंग की। यह जंग बक्सर के मकाम पर हुई। इस लड़ाई में अंग्रेजों को कामयाबी हुई। जंग खत्म होने पर एक मुआहिदा तय पाया। तारीख में यह मुआहिदा इलाहाबाद के नाम से मशहूर है। 1765 में यह मुआहिदा (अंग्रेज) क्लाइव और नवाब शुजाउद्दौला और शाह आलम के दरमियान तय पाया था। इसकी रविश से बादशाह दिल्ली (शाह आलम सानी) की तरफ से ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार, उड़ीसा का दीवान (हाकिम) मुकर्रर कर दिया यानी कंपनी उन इज़ाफ़ों से माल-गुज़ारी (ज़मीन का महसूल, मालिया वगैरह) वसूल कर सकती है। अगर इस मुआहिदे को हिन्दुस्तान की ग़ुलामी की इब्तिदा कहा जाए तो दुरुस्त होगा। शाह आलम सानी ने अंग्रेजों की इताअत कुबूल कर ली और वह अंग्रेजों का वज़ीफ़ाख़ोर हो गया। बादशाह पूरे दस बरस बाद इलाहाबाद से दिल्ली आया। वह यहां आकर नए फितनों, उमरा के जोड़-तोड़, रुहेलों की नई ताक़त और सिखों के हमलों से दो-चार हुआ। बल-आख़िर नजीबुद्दौला के पोते ग़ुलाम कादिर रुहेला ने 1788 में दिल्ली पर कब्जा कर लिया, शाही महल लूटा, शहजादियों को कोड़े लगवाए और सल्तनत-ए-तैमूरी के वारिस मुग़ल शहंशाह की आंखें नोक-ए-खंजर से निकालीं। 1789 में सिंधिया (मराठा) ने ग़ुलाम कादिर को बड़े दर्दनाक तरीके पर क़त्ल किया और शाह आलम को दोबारा तख्त पर बिठाया।


टीपू सुल्तान की शहादत

मैसूर की हिंदू रियासत का दिलेर सिपहसालार हैदर अली (राजा के कमज़ोर हो जाने पर) 1761 में मैसूर रियासत का सरबराह बना दिया गया। इसने 22 साल हुकूमत करके रियासत की शीराज़ाबंदी की। अपने बेटे फ़तह अली को अपना जानशीन बनाकर 1783 में वफात पा गया।

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फ़तह अली उर्फ टीपू सुल्तान

1783 से 1799 तक फ़तह अली (उर्फ टीपू सुल्तान) ने इक़तिदार संभाला। इस वक्त यह दौर हिन्दुस्तान में इश्तिराक का दौर था।

"चिराग बेदाग हो तो आईने की शहादत की ज़रूरत नहीं पड़ती। ज़मीर ज़िंदा हो तो किसी पर बद-एतमाद होने को जी नहीं चाहता।"


मीर सादिक़ और एक हिंदू वज़ीर सबसे पहले अपने आका के क़त्ल में अंग्रेज के आला-ए-कार बने। सुल्तान का घुड़सवार फौज का कमांडर बदरुज्जमान अंग्रेज से जागीर के लालच में सौदा कर चुका था। अंग्रेजों ने वज़ीर-ए-आज़म मीर सादिक़ और कई उमरा को मल लिया और रियासत पर बड़ी फौज से हमला कर दिया। टीपू सुल्तान किले में महफूज़ था, मगर ग़द्दारों ने दरवाज़ा खोल दिया। अंग्रेजी फौज किले में घुस आई। टीपू सुल्तान बड़ी दिलेरी से लड़ता हुआ शहीद हुआ। सुल्तान की शहादत के बाद अंग्रेज ने किले और महलात पर कब्जा कर लिया। सुल्तान का झंडा उतारकर अंग्रेज ने अपना झंडा लहरा दिया। इसके बाद एक जनरल ने कहा:

"आज हिन्दुस्तान की आख़िरी कड़ी भी टूट गई। अब दुनिया की कोई ताक़त हिन्दुस्तान को हमारी ग़ुलामी से नहीं बचा सकती।"


टीपू सुल्तान की वसीयत

मैं खुश हूं कि एक काफ़िर के मुकाबले में लड़कर खुदा के रास्ते में जान दे रहा हूं। खुदा का शुक्र है कि मैं फिरंगी फौज को मारते-मारते जान दे रहा हूं। काश! कोई मेरे बाद इन फिरंगियों को हिन्दुस्तान से निकाल भगाए। इस वक्त तक मेरी रूह को कब्र में चैन नहीं आएगा, जब तक हिन्दुस्तान की सरज़मीन फिरंगियों से पाक न हो जाए।



दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा

1803 में लॉर्ड लेक अंग्रेजी फौज के साथ दिल्ली में दाखिल हुआ, मराठों को निकाल दिया और बादशाह की पेंशन एक लाख रुपया सालाना मुकर्रर कर दी।

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'हिन्दुस्तान दारुल हर्ब है' का फतवा

अंग्रेज की जाहिर पॉलिसी रही कि बादशाह दिल्ली को तख्त-ओ-ताज के साथ ज्यों का त्यों रहने दिया गया, लेकिन मुल्की इख्तियारात तमाम के तमाम ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए तस्लीम करा लिए गए। इस तरह यह इलान होने लगा:

"ख़ल्क खुदा की, मुल्क बादशाह सलामत का, और हुक्म कंपनी (यानी अंग्रेज) बहादुर का।"


इन मुश्किल-तर लम्हों में हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस दिल्ली के बड़े साहिबज़ादे हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज ने हिन्दुस्तान को दारुल हर्ब होने का फतवा दे दिया। शाह आलम सानी 45 बरस तख्तनशीन और 18 साल नाबीना रहकर 1806 में राही-ए-मुल्क-ए-बक़ा हुआ।


सिंध पर अंग्रेजों का कब्जा

शाह अफगानिस्तान शाह शुजा के ज़माने में अंग्रेज, रणजीत सिंह और शाह शुजा के दरमियान एक मुआहिदे पर दस्तखत हुए। इस मुआहिदे की रविश से कश्मीर, पेशावर और मुलतान पर रणजीत सिंह का कब्जा तस्लीम कर लिया गया, जिसके बदले रणजीत सिंह ने सिंध से दस्तबरदार होने का फैसला कर लिया। इस तरह सिंध काबुल का एक सूबा करार पाया। अब काबुल पर अंग्रेज की कठपुतली हुकूमत कायम थी। सिंध पर कब्जा करने में अब अंग्रेज के रास्ते में कोई दूसरी दीवार नहीं थी। यह ज़माना सिंध पर तालपुर ख़ानदान की हुक्मरानी का था। अंग्रेज ने अमीर सिंध को रणजीत सिंह के हमले का खौफ दिलाकर सिंध को अपनी निगरानी में ले लिया। जब तालपुर ख़ानदान का मीरपुर में तख्तनशीनी का तनाज़ा शुरू हुआ तो अंग्रेज ने मीर अली मुराद के हक में फैसला दे दिया। नए अमीर ने खिराज के बदले सिंध के अहम इलाके अंग्रेज कंपनी के हवाले कर दिए। मुख्तसर यह कि अंग्रेजों ने मार्च 1843 को मीरपुर पर कब्जा कर लिया और अगस्त 1843 को अमीर सिंध को जलावतन करके पूरे सिंध का इलहाक अपने साथ कर लिया।


पंजाब में अंग्रेजों की आमद

सिंध के बाद जब अंग्रेज की नज़रें पांच दरियाओं के इस खूबसूरत ख़ित्ता-ए-अर्ज़ पर पड़ीं तो उस वक्त रणजीत सिंह उसकी बहारें लूट रहा था। पंजाब का यह सिख हाकिम अनपढ़ होने पर भी बड़ा ज़ेरेक और मुआमला-फ़हम हुक्मरान था। 1839 को रणजीत सिंह का इंतिक़ाल हो गया। पंजाब के इस सिख हुक्मरान को शेर-ए-पंजाब का खिताब दिया गया। रणजीत सिंह के बाद हर सिख सरदार ने वह फ़ितूर मचाया कि पंजाब तबाह होकर रह गया। रणजीत सिंह के कई बेटों को मौत के घाट उतार दिया गया। बल-आख़िर रणजीत सिंह का नाबालिग बेटा दिलीप सिंह गद्दीनशीन हुआ। इसकी वालिदा रानी (अल-मारूफ जींदां) अपने चहेते लाल सिंह समेत राज की सरबराह बन गई। अंदरूनी ख़िलफ़शार रुक न सका। दिसंबर 1845 में सिख और अंग्रेजों के दरमियान जंग शुरू हो गई। सिखों को शिकस्त उठाना पड़ी। सुलहनामा लाहौर के नाम से मुआहिदा हुआ। सतलज और ब्यास के इलाके अंग्रेज सल्तनत में शामिल कर लिए गए। बल-आख़िर मार्च 1849 में लॉर्ड डलहौजी ने पंजाब को अपनी क़लमरो (अमलदारी) में शामिल कर लिया। रणजीत सिंह के बेटे दिलीप सिंह को पेंशन देकर लंदन भेज दिया। वहां उसने ईसाई मज़हब कुबूल कर लिया।

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जंग-ए-आज़ादी और उलमा-ए-देवबंद का किरदार

ताबीर-ए-पाकिस्तान के मुसन्निफ: एस एम शाहिद, शोबा-ए-तालीम, उस्ताद अल्लामा इक़बाल ओपन यूनिवर्सिटी, इस्लामाबाद, सफ़ा 60 पर तहरीर फरमाते हैं कि:

(शाह आलम सानी) की वफात के बाद इसके बक़ैद-ए-हयात लड़कों में जो सबसे बड़ा लड़का था, वह तख्तनशीन 1806 में हुआ। इसने अपना लक़ब अकबर शाह सानी इख्तियार किया। 1837 में जब इसका इंतिक़ाल हुआ तो मिर्जा अब्दुल मुज़फ्फर सिराजुद्दीन मुहम्मद इसके जानशीन की हैसियत से बहादुर शाह का लक़ब इख्तियार करके तख्तनशीन हुआ। बहादुर शाह आख़िरी मुग़ल ताजदार था। चुनांचे मुग़लिया सल्तनत एक ज़ाहिरी और नुमाइशी सल्तनत के रूप में 1857 तक चलती रही। सल्तनत-ए-मुग़लिया का शीराज़ा पूरी तरह बिखर गया था। ज़वालपज़ीर दौर में रोशनी की कुछ किरणें अगर नज़र आ रही थीं तो वह महज़ शाह वलीउल्लाह देहलवी, उनके साहिबज़ादे शाह अब्दुल अज़ीज और उनके पोते मौलाना शाह इस्माईल की तहरीकात: "ततहीर" और "इस्लाह" थीं और सैयद अहमद बरेलवी का बहादुराना और सरफ़रोशाना मुकाबला था।


बर-ए-सग़ीर पाक-ओ-हिन्द की सियासत में उलमा का किरदार

1945 तक के मुसन्निफ डॉक्टर एच बी खान सफ़ा 22 पर तहरीर करते हैं:

1857 की जंग-ए-आज़ादी में अहल-ए-हिन्द ने मुल्क से बैरूनी ताक़त के इख़राज और हुसूल-ए-आज़ादी के लिए जद-ओ-जहद की थी। अहद-ए-ब्रिटानिया से मुल्की और ग़ैर-मुल्की मुअर्रिख़ीन इस जंग को बग़ावत के नाम से मोसम्म करते चले आए हैं जो एक तारीखी ग़लती है। जंग-ए-आज़ादी के इलल-ओ-असबाब मुतनव्वे भी हैं और मुख़्तलिफ-फ़ीह भी। उन पर मुअर्रिख़ीन ने बिल-तफ़सील बहस भी की है। यहां मौज़ू की मुनासिबत से हम सिर्फ मज़हबी वजूहात से मुख्तसर बहस कर रहे हैं:

**अ:** मुग़ल ताजदार से कंपनी ने अहद किया था कि हम क़ज़ात (यानी क़ाज़ी) का ओहदा बरकरार रखेंगे। इब्तिदा में इस अहद पर अमल होता रहा, मगर जैसे-जैसे अंग्रेजों का इक़तिदार-ओ-ग़लबा मज़बूत होता गया, वैसे-वैसे इस अहद में कमज़ोरी और लचक पैदा होती गई, ता आं कि 1865 में क़ज़ात को खत्म कर दिया।

**ब:** एक ब्रिटिश मुअर्रिख मिस्टर लडलो और एक दूसरे मुअर्रिख प्रोफेसर मैक्स और तीसरे ब्रिटिश बाशिंदे ने अलहदा-अलहदा बयान किया है कि जब से हमने देसी तरीका-ए-तालीम को खत्म किया है, तब से हिन्दुस्तानी बे-इल्म होते जा रहे हैं। मिस्टर ने सरकारी कागज़ात के हवाले से लिखा है कि:

ब्रिटेन से पहले बंगाल में अस्सी हज़ार देसी मदारिस थे। नज़ कीप्टन ने अपने सफ़रनामा में लिखा है कि: शहर ठठ में आलमगीर और औरंगजेब के ज़माने में चार सौ कॉलेज मुख़्तलिफ उलूम-ओ-फ़ुनून के थे।

**ज:** अहद-ए-सल्तनत दिल्ली ओ अहद-ए-मुग़ल में मुआल्लिमीन और मुताअल्लिमीन के लिए वज़ीफ़े और अतियात दिए जाते थे। नज़ अवक़ाफ की आमदनी से मदारिसीन ओ तुलबा की मुस्तकिल्लान माली इआनत का इंतज़ाम था। 1835 में अवक़ाफ की ज़ब्ती से यह मदारिस तबाह-ओ-बर्बाद हो गए।

**द:** कंपनी ने शुरू अमलदारी से ही पादरियों की सरपरस्ती की। इन पादरियों ने मुख़्तलिफ तरीकों से ज़र-ए-कसीर सर्फ करके लोगों को मुरतद बनाना शुरू किया। चुनांचे लोगों को ख़ौफ हुआ कि हमारा दीन-ओ-मज़हब भी महफूज़ न रह सकेगा।


जांबाज मिर्जा तहरीर फरमाते हैं:

"मेहमान बनकर आने वाले जब हाकिम बन बैठे तो अपने तख्त पर इस क़द्र इतराते कि इब्लीस के हमदोश होकर इंसान को ग़ुलाम बनाकर भी उनसे हयवानों का सा बरताव करने लगे। अवाम नए हाकिमों से दस्त-ओ-गिरेबान होने के बहाने तलाश करने लगी।"


हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज मुहद्दिस देहलवी का फतवा मुस्लिम अवाम के दिलों में जिहाद की आग रोशन कर चुका था। हिंदू ईसाई पादरियों के तरीके-ए-तबलीग से धर्म की रुसवाई देख रहे थे। इंसान होने के नाते से भी अंग्रेजों का बरताव रिआया से ज़ालिमाना था। अंग्रेजों के कदम जमने लगे तो फौजियों के लिए ऐसे अहकाम जारी किए जो किसी तरह भी उनके लिए पसंदीदा नहीं थे। मिसालन: देसी सिपाही जब फौजी लिबास में हों तो माथे पर तिलक न लगाएं और न उनके कानों में बालियां हों। सिपाहियों को चाहिए कि अपनी दाढ़ियां मुंडवाया करें। पगड़ी की जगह टोपी इस्तेमाल करें। इन अहकाम से क़ुदरती तौर पर इस ख़याल को और तक़्वीयत मिली कि अंग्रेज हिन्दुस्तानियों की वज़-ए-कतअ, रस्म-ओ-रिवाज और तौर-तरीकों में दखलंदाजी करके उनके मज़हब को खराब करना चाहते हैं।


चर्बी के कारतूस

1853 में इंग्लैंड से एक खास किस्म के कारतूस का ज़खीरा हिन्दुस्तानी फौज के इस्तेमाल के लिए भेजा गया। इन कारतूसों में सूअर की चर्बी इस्तेमाल की गई थी। चर्बी वाले कारतूस को दांतों से काटना पड़ता था। कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी क़स्दन इसलिए इस्तेमाल की गई कि हिंदुओं और मुसलमानों का मज़हब खराब किया जाए। हिंदुओं को तो गाय की झिल्ली का इश्तिबाह वाक़े हुआ और अहल-ए-इस्लाम को सूअर की झिल्ली का। चुनांचे एक दिन ऐसा हुआ कि कोलकाता में एक फिरंगी सिपाही ने एक ब्राह्मण जात के फौजी सिपाही से पानी तलब किया। इस पर ब्राह्मण ने कहा: तुम म्लेच्छ (नापाक) हो, मैं तुम्हें पानी नहीं दूंगा। मेरा धर्म मुझे ऐसा करने से मना करता है। फिरंगी सिपाही ने तंज़ के तौर पर कहा: इस वक्त तुम्हारा धर्म क्या रह जाएगा जब तुम्हें गाय और सूअर की चर्बी के कारतूस इस्तेमाल करने पड़ेंगे। यह जनवरी 1857 का वाक़या है। इस खबर से कोलकाता की फौज में इश्तिआल हुआ तो मेजर क्वाना ने इसे दबा दिया। अलबत्ता यह खबर फैलकर बैरकपुर पहुंची तो वहां की फौज ने अफसरों की हुक्म-ए-उदूली की। जिस पर इस मज़मूम फज़ा में बरेली के कोचा-ओ-बाजार में एक इश्तिहार पाया गया, जिसकी इबारत थी: हिंदुओ और मुसलमानो उठो! अल्लाह तआला की बख्शी हुई नेमतों से आज़ादी सबसे बड़ी नेमत है। क्या वह ज़ालिम शैतान जिन्होंने हमसे आज़ादी छीन ली है, हमें हमेशा से आज़ादी से महरूम रख सकते हैं? हरगिज़ हरगिज़ नहीं वगैरह। चलते-चलते इस किस्म के इश्तिहार दिल्ली, लखनऊ, आगरा, बनारस, इलाहाबाद, झांसी, हैदराबाद दक्कन, कानपुर और मद्रास तक जा पहुंचे थे। गो इश्तिहारात की इबारत मुख़्तलिफ थी, ताहम मफहूम एक ही था यानी हिंदू और मुसलमानों को उकसाया गया था। कंपनी की हुकूमत ने लाख कोशिश की कि इन इश्तिहारात के मुसन्निफ या मुहर्रिक का पता लग सके, मगर तमाम कोशिश नाकाम साबित हुई।


दूसरी तरफ, पंडित, मौलवी, संन्यासी मुल्क के एक कोने से दूसरे कोने तक फैलकर अंग्रेजों के खिलाफ इंकलाबी तक़रीरें कर रहे थे। यहां तक कि मदारी और भांड, पुतलियां नचाने वाले भी अपने खेल-तमाशों के ज़रीए तमाशाईयों को जंग-ए-आज़ादी का पैगाम दे रहे थे। लोग बाजारों और चौपालों में बैठकर मौलवियों का वअज़ सुनते। मुसलमान कुरआन पर हाथ रखकर और हिंदू गंगाजल उठाकर कसमें खाते कि फिरंगियों को अपने देश से निकालकर दम लेंगे। इस दौरान अंदर-ए-खाने एक और तहरीक रवां-दवां थी यानी काठ की रुई और कमल का फूल दोनों एक साथ लिए हुए देहात-देहात फिरकर किसानों और देहातियों को जंग-ए-आज़ादी में शुमूलियत की दावत दी जा रही थी, जिससे मुराद यह थी कि रुई के हुसूल के लिए फूल की पत्तियों की तरह एक साथ मिलकर मुहब्बत और प्यार की खुशबू मुल्क में पैदा करें और ग़ैर-मुल्कियों से निजात हासिल करें। (अंग्रेज के बाग़ी मुसलमान सफ़ा 89 से 95)


इसलिए तमाम हिन्दुस्तानियों ने उमूमन और मुसलमानों ने ख़सूसन इस इंकलाब 1857 को ज़रूरी समझा और मुकर्रर किया गया कि 11 मई या 31 मई को तमाम हिन्दुस्तान में इंकलाबी कारवाई अमल में लाई जाए और अलम-ए-जिहाद बुलंद किया जाए। मगर अफसोस कि इस पर अमल न हुआ, बल्कि 22 मार्च को बर्रकपुर (सूबा बंगाल) में मंगल पांडे के हाथों (दो महीने पहले) यह आतिशी माद्दा भड़क उठा। एक दिन दोपहर के वक्त एक फौजी सिपाही मंगल पांडे बंदूक लिए परेड के मैदान में आ खड़ा हुआ और जोर-जोर से चिल्लाने लगा। भाइयो! उठो और मक्कार दुश्मनों पर हमला करके आज़ादी हासिल कर लो। उसका यह कहना था कि सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने उसकी गिरफ्तारी का हुक्म दे दिया, मगर इस हुक्म की तामील किसी हिन्दुस्तानी सिपाही ने न की। इतने में मंगल पांडे ने 'दीन दीन' का नारा लगाकर मेजर ह्यूसन पर फायर कर दिया, जिससे वह हलाक हो गया। इतने में रेजीमेंट के एडजुटेंट लेफ्टिनेंट बाग को इस वाक़ये की इत्तिला मिली और वह फौरन मौके पर पहुंचा। वह घोड़े से उतरा ही था कि मंगल पांडे ने उस पर भी गोली चला दी, मगर निशाना ठीक न बैठा। लेफ्टिनेंट बाग ने फौरन तलवार से काम लेना चाहा, मगर मंगल पांडे ने उसे फुर्सत न दी कि उस पर फायर कर दिया जिससे वह जहन्नुम वासिल हुआ। जनरल हियर अंग्रेज सिपाहियों की पलटन के हमराह मौके-ए-वारदात पर पहुंच गया। मंगल पांडे गिरफ्तार हुआ, कोर्ट मार्शल हुआ और 8 अप्रैल 1857 को फांसी पर लटका दिया गया। इस वाक़ये ने देसी सिपाहियों को इस क़द्र मुश्तअल कर दिया कि मई 1857 से पहले ही एक्शन शुरू हो गया। वहां की दो रेजीमेंटें (19वीं और 34वीं) अप्रैल खत्म होने से पहले तोड़ दी गईं। जो आग कोलकाता से शुरू हुई थी वह अंबाला, लखनऊ से होती हुई मेरठ तक आ पहुंची। 23 अप्रैल 1857 को मेरठ में इस वाक़ये का फिर इआदा किया गया यानी पचास अफसरों और सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इन्कार कर दिया। इस जुर्म में उन्हें मार्शल लॉ कोर्ट के तहत दस-दस साल क़ैद सुनाई गई। बल-आख़िर 10 मई 1857 को हिन्दुस्तानी फौजी ने अपने अंग्रेज अफसरों को क़त्ल करके जेल तोड़कर सिपाहियों को रिहा करा लिया, बाकी फौज भी उनसे मिल गई और यह तमाम फौज दिल्ली रवाना हो गई।

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