स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम उलमा (इस्लामी विद्वानों) के बलिदान
स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम उलमा (इस्लामी विद्वानों) के बलिदान
हिंदुस्तान की इस्लामी मदरसों ने जहालत और नाख्वांदगी के क़िले क़ुमत, उलूम व फ़ुनून की तालीम व इशाअत और मिल्लत-ए-इस्लामिया की दीनी व मिल्ली क़ियादत व रहनुमाई का फ़रीज़ा ही अंजाम नहीं दिया है, बल्कि मुल्क व मिल्लत के वसीओ तर मफ़ाद में भी इन मदरसों की खिदमात बड़ी रोशन हैं, बल-ख़ुसूस ब्रिटिश साम्राज़ के ज़ुल्म-ओ-इस्तिबदाद और ग़ुलामी-ओ-महकूमी से निजात दिलाने और इब्नाए-ए-वतन को अरूस-ए-हुरियत से हम-किनार कराने में, मदारिस-ए-इस्लामिया और उनके क़ायदीन की कुर्बानियाँ आब-ए-जर से लिखी जाने के क़ाबिल हैं। वह मदारिस-ए-इस्लामिया के जानबाज़ उलमा-ए-किराम ही तो थे जिन्होंने मुल्क में आज़ादी का सूर उस वक्त फूँका जब आम तौर पर दूसरे लोग ख़्वाब-ए-ग़फ़्लत में मस्त, आज़ादी की ज़रूरत-ओ-अहमियत से ना-बालिद और इहसास-ए-ग़ुलामी से भी आरी थे।
इसी दरिया से उठती है वह मौज-ए-तुन्द-ए-जवलाँ भी,
नहंगों के नशीमन जिस से होते हैं तह-ओ-बाला।
मगर यह भी बड़ा क़ौमी अलमिया है कि 15 अगस्त के तारीख़साज़ और यादगार क़ौमी दिन के मुबारक-ओ-मसऊद मौके पर जब मुजाहिदीन-ए-आज़ादी की कुर्बानियों को याद किया जाता है, उनको ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया जाता है, तो उन उलमा-ए-किराम और मुजाहिदीन-ए-हुरियत को यकसर नज़र-अंदाज़ कर दिया जाता है जिन्होंने मुल्क की आज़ादी की ख़ातिर क़ैद-ओ-बंद की सुओबतें बरदाश्त कीं, माल्टा और काला पानी में हर तरह की आज़ातें झेलीं और जान-नसारी-ओ-सरफ़रोशी की ऐसी मिसाल क़ायम कीं जिनकी नज़ीर नहीं मिलती और मुल्क का चुप्पा-चुप्पा उनकी कुर्बानियों का चश्म-ए-दीद गवाह है।
पता पता, बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है।
मुल्क का एक तबक़ा इस ग़लतफ़हमी में मुब्तिला है कि दीनी-ओ-इस्लामी मदारिस, क़ौमी धारे से बिल्कुल अलग-थलग, मुल्की-ओ-क़ौमी मफ़ाद से बे-परवा होकर सिर्फ़ दीनी तालीम की इशाअत में लगे रहते हैं, मदरसों के फ़ज़ला गिर्द-ओ-पेश के हालात से बे-ख़बर और मुल्की-ओ-क़ौमी खिदमत के शऊर-ओ-इहसास से भी आरी होते हैं। लेकिन मदारिस-ए-इस्लामिया का शानदार माज़ी, इस मफ़रूज़े को क़तअन ग़लत और बे-बुनियाद करार देता है, और तारीख़-ए-हिन्द की पेशानी पर सबित, मदारिस-ए-इस्लामिया की मुल्की-ओ-क़ौमी खिदमात और करनामों के नक़ूश पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि मदारिस-ए-इस्लामिया के उलमा-ए-किराम व फ़ज़लाए-ए-आज़म ने हमेशा मुल्की मफ़ाद की पासबानी और अपने ख़ून-पसीने से चमनिस्तान-ए-हिन्द की आबयारी की है और मुल्क की आज़ादी की तारीख़ इन कुर्बानियों से लाला-ज़ार है।
चुनांचे उन हज़ारों उलमा-ए-किराम और मुजाहिदीन-ए-आज़ादी की एक लम्बी फ़हरिस्त है जिन्होंने आज़ादी की ख़ातिर हर तरह की कुर्बानियाँ पेश कीं और क़ायदाना रोल अदा किया, ख़ुसूसन:
- हज़रत मौलाना शाह वलीउल्लाह देहलवी
- मौलाना शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी
- मौलाना शाह रफ़ीउद्दीन देहलवी
- मौलाना शाह अब्दुल क़ादिर देहलवी
- मौलाना सैयद अहमद शहीद राय बरेलवी
- मौलाना सैयद इस्माईल शहीद देहलवी
- मौलाना शाह इस्हाक़ देहलवी
- मौलाना अब्दुल हयी बड्ढानवी
- मौलाना विलायत अली अज़ीमाबादी
- मौलाना जाफ़र थानेसरी
- मौलाना अब्दुल्लाह सादिक़ पुरी
- मौलाना नज़ीर हुसैन देहलवी
- मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़रदा
- मुफ़्ती इनायत अहमद काकोरी
- मौलाना फ़रीदुद्दीन शहीद देहलवी
- सैयदुल ताइफ़ा हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की
- इमाम-ए-हुरियत मौलाना मुहम्मद क़ासिम नानोत्वी
- मौलाना रशीद अहमद गंगोही
- क़ाज़ी इनायत अहमद थानवी
- क़ाज़ी अब्दुर रहीम थानवी
- हाफ़िज़ ज़ामिन शहीद
- मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी
- मौलाना फ़ैज़ अहमद बदायूँनी
- मौलाना अहमदुल्लाह मद्रासी
- मौलाना फ़ज़ल-ए-हक़ ख़ैराबादी
- मौलाना रज़ीउल्लाह बदायूँनी
- इमामुल हिंद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
- इमाम-ए-इंकलाब शैखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी
- मौलाना शाह अब्दुर रहीम रायपुरी
- मौलाना मुहम्मद अली जौहर
- मौलाना हसरत मोहानी
- मौलाना शौकत अली रामपुरी
- मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी
- मौलाना डॉक्टर बरकतुल्लाह भोपाली
- शैखुल इस्लाम मौलाना सैयद हुसैन अहमद मदनी
- मौलाना किफ़ायतुल्लाह देहलवी
- मौलाना सैफ़ुर रहमान काबली
- मौलाना वहीद अहमद फ़ैज़ाबादी
- मौलाना मुहम्मद मियाँ अंसारी
- मौलाना अज़ीर गुल पेशावरी
- मौलाना हकीम नसरत हुसैन फ़तहपुरी
- मौलाना अब्दुल बारी फ़रंगी महल्ली
- मौलाना अबुल महासिन सज्जाद पटनवी
- मौलाना अहमद सईद देहलवी
- मुजाहिद-ए-मिल्लत मौलाना हिफ़्ज़ुर रहमान सिव्हारवी
- मौलाना मुहम्मद मियाँ देहलवी
- मौलाना अता उल्लाह शाह बुख़ारी
- मौलाना हबीबुर रहमान लुधियानवी
- मौलाना अहमद अली लाहौरी
- मौलाना अब्दुल हलीम सिद्दीक़ी
- मौलाना नूरुद्दीन बिहारी
वग़ैरह आसमान-ए-हुरियत के वह ताबिन्दा सितारे हैं जिन्होंने महकूमी की शब-ए-दीजूर को तार-तार किया और मुल्क के चुप्पे-चुप्पे को अन्वार-ए-हुरियत की ज़ुफ़्फ़शानी से मामूर कर दिया।
> ये हिंद में सरमाया-ए-मिल्लत के निगहबाँ,
> अल्लाह ने बर-वक़्त किया उनको ख़बरदार।
मज़कूरह मुजाहिदीन-ओ-उलमा-ए-किराम सब मदारिस-ए-इस्लामिया ही के फ़ज़ला व फ़ैज़-याफ़्ता थे। एक-दो हुज़ूर ऐसे हैं जो बाज़ाब्ता किसी मदरसे के फ़ारिग़ न थे लेकिन उलमा-ए-किराम के बाज़ाब्ता सोहबत-याफ़्ता ज़रूर थे। इनमें वह उलमा-ए-किराम भी हैं जिन्होंने जद-ओ-जहद-ए-आज़ादी का इब्तिदा किया और हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ साहिब और फिर सैयद अहमद शहीद की ज़ेर-ए-क़ियादत काम करते रहे और उनके बाद भी जद-ओ-जहद जारी रखी। वह उलमा-ए-किराम ही हैं जिन्होंने 1857 की जंग-ए-आज़ादी में बनफ़्स-ए-नफ़ीस शिरकत फ़रमाई। फिर वह उलमा-ए-किराम हैं जो ज़ाएम-ए-हुरियत शैखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी और इमामुल हिंद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की ज़ेर-ए-क़ियादत जंग-ए-आज़ादी में शरीक रहे। इन हुज़ूरात की कुर्बानियों की एक झलक पेश करने के लिए हमें सिलसिलेवार वाक़िआत पर एक नज़र डालनी होगी।
सोलहवीं सदी ईसवी के ख़त्म होते-होते अंग्रेज़ी सूदागर हिंदुस्तान पहुँच चुके थे। 1601 में मलिका एलिज़ाबेथ की इजाज़त से एक सौ ताजिरों ने तीस हज़ार पाउंड की ख़तीर रक़म लगाकर एक तिजारती इदारा 'ईस्ट इंडिया कंपनी' के नाम से क़ायम किया। मग़रबी बंगाल को कंपनी ने अपना मर्कज़ बनाया और डेढ़ सौ साल तक अपनी तमाम तर तवज्जोह सिर्फ़ तिजारत पर मर्कूज़ रखी। लेकिन जब हज़रत औरंगज़ेब आलमगीर, और मुअज़्ज़म शाह के बाद मुग़लिया हुकूमत की बुनियादें कमज़ोर पड़ गईं और मुल्क में अनारकी और तवाइफ़ुल मुलूकी का दौर-दौरा हुआ तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना मुखौटा उतार फेंका और निज़ाम-ए-हुकूमत में मुदाख़लत शुरू कर दी। 1757 में पलासी की जंग में नवाब सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों की फ़ौजें ख़ुलम-ख़ुला मैदान में आ गईं और नंग-ए-मिल्लत, नंग-ए-दीन और नंग-ए-वतन मीर जाफ़र की ग़द्दारी के सबब नवाब सिराजुद्दौला को शिकस्त का मुँह देखना पड़ा और पूरे बंगाल पर अंग्रेज़ क़ाबिज़ हो गए। फिर 1764 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नवाब शुजाअउद्दौला को बक्सर में शिकस्त हुई और बिहार-ओ-बंगाल अंग्रेज़ की दीवानी में चले गए। 1792 में बतिल-ए-हुरियत सुल्तान टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज़ों ने मैसूर पर क़ब्ज़ा कर लिया। 1849 में पंजाब भी कंपनी के क़ब्ज़े में आ गया। इसी तरह सिंध, आसाम, बर्मा, अवध, रुहेलखंड, जनूबी दोआबा, अलीगढ़, शुमाली दोआबा, मद्रास-ओ-पांडीचेरी वग़ैरह अंग्रेज़ों के ज़ेर-ए-तसल्लुत आ गए और फिर वह वक़्त भी आ पहुँचा जब दिल्ली पर भी कंपनी की हुकूमत क़ायम हो गई और मुग़ल बादशाह का सिर्फ़ नाम रह गया। इन इलाक़ों पर अंग्रेज़ों ने फ़तह हासिल करने के लिए क्या-क्या तदबीरें कीं, मिसिज़ एनी बेसेंट की ज़बानी सुनिए:
"कंपनी वालों की जंग सिपाहियों की जंग न थी बल्कि ताजिरों की जंग थी। हिन्दुस्तान को इंग्लैंड ने अपनी तलवार से फ़तह न किया बल्कि ख़ुद हिन्दुस्तानियों की तलवार से और रिश्वत-ओ-साज़िश, निफ़ाक़, और हद-दर्जा की दोरुखी पॉलिसी पर अमल करके एक जमाअत को दूसरी जमाअत से लड़ाकर उसने यह मुल्क हासिल किया।"
मुल्क में ईस्ट इंडिया कंपनी के फैलते हुए जाल और बढ़ते हुए असर-ओ-रिसूख को सबसे पहले अगर किसी ने महसूस किया तो वह हज़रत मौलाना शाह वलीउल्लाह देहलवी की उबक़री शख़्सियत थी। आप ने पूरी दूर-अंदेशी के साथ इस्लाह के उसूल बयान किए, तरीक़ा-ए-कार की निशानदेही फ़रमाई और बाशिंदगान-ए-वतन के बुनियादी हक़ूक पामाल करने वाले निज़ाम-ए-हुकूमत को दरहम-बरहम कर देने की तलक़ीन की और इसके लिए ताक़त के इस्तेमाल पर भी ज़ोर दिया। उनके मुतअय्यन किए हुए नक़्शा-ए-राह के मुताबिक उनके फ़रज़ंद-ए-अकबर हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी ने ब्रिटिश इस्तेमार के ख़िलाफ़ जद-ओ-जहद का मुनज़्ज़िम इब्तिदा किया, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ तारीख़साज़ फ़तवा सादिर फ़रमाया और मुल्क के दारुल हर्ब होने का इलान किया जो अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ इलान-ए-जिहाद के मुतरादिफ़ था। यह फ़तवा जंगल की आग की तरह मुल्क के कोने-कोने में पहुँच गया। 1818 में अवाम की ज़ेहन साज़ी के लिए मौलाना सैयद अहमद शहीद, मौलाना इस्माईल देहलवी, और मौलाना अब्दुल हयी बड्ढानवी की मुशाविरत में एक जमाअत तशकील दी गई जिसने मुल्क के अतराफ़ में पहुँचकर दीनी और सियासी बेदारी पैदा की। फिर अंग्रेज़ों से जिहाद के लिए 1820 में मौलाना सैयद अहमद शहीद राय बरेलवी की क़ियादत में मुजाहिदीन को रवाना किया गया। उन्होंने जंगी ख़ुसूसियात की बिना पर जिहाद का मर्कज़ सूबा-ए-सरहद को बनाया। मक़सद अंग्रेज़ों से जिहाद था लेकिन पंजाब के राजा अंग्रेज़ों के वफ़ादार थे, इस जिहाद के मुख़ालिफ़ थे और इसे नाकाम करने की तदबीरें कर रहे थे। इसलिए पहले हज़रत सैयद अहमद शहीद ने उनको पैग़ाम भेजा कि "तुम हमारा साथ दो, दुश्मनों (अंग्रेज़ों) के ख़िलाफ़ जंग करके हम मुल्क तुम्हारे हवाले कर देंगे, हम मुल्क-ओ-माल के तालिब नहीं।" लेकिन राजा ने अंग्रेज़ की वफ़ादारी तर्क न की तो उससे भी जिहाद किया गया। 1831 में बालाकोट के मैदान में हज़रत मौलाना राय बरेलवी ने जाम-ए-शहादत नोश किया, मगर उनके मुतावस्सिलीन ने हिम्मत नहीं हारी बल्कि मुल्क के मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ गोरिल्ला जंग जारी रखी। 1857 की जंग के लिए सैयद साहिब के मुतावस्सिलीन-ओ-मुजाहिदीन ने फ़ज़ा हमवार करने और अफ़राद तैयार करने में अहम किरदार अदा किया।
**1857 की जंग-ए-आज़ादी** में उलमा-ए-किराम ने बाक़ायदा जंग में हिस्सा लिया। यह उलमा-ए-किराम हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी, हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी और हज़रत सैयद अहमद शहीद रहिमहुमुल्लाह की सिलसिलत-अज़-ज़हब (तिलाई ज़ंजीर) की सुनहरी कड़ी थे। इस जंग के लिए उलमा-ए-किराम ने अवाम को जिहाद की तरग़ीब दिलाने के लिए मुल्क के तूल-ओ-अरज़ में वअज़-ओ-तक़रीर का बाज़ार गर्म कर दिया और जिहाद पर उभारने का फ़रीज़ा अंजाम दिया। निज़ एक मुत्तफ़िक़ फ़तवा जारी करके अंग्रेज़ों से जिहाद को फ़र्ज़-ए-अयन करार दिया। इस फ़तवे ने जलते पर तेल का काम किया और पूरे मुल्क में आज़ादी की आग भड़क उठी। अकाबिर-ए-उलमा-ए-देवबंद ने शामली के मैदान में जिहाद में ख़ुद शिरकत की। हज़रत मौलाना क़ासिम नानोत्वी, हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही और हाफ़िज़ ज़ामिन शहीद ने हज़रत सैयदुत ताइफ़ा हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की के हाथ पर बैअत-ए-जिहाद की। फिर तैयारी शुरू कर दी गई। हज़रत हाजी साहिब को इमाम मुकर्रर किया गया। मौलाना मुनीर नानोत्वी को फ़ौज के दाएँ बाज़ू का और हाफ़िज़ ज़ामिन थानवी को बाएँ बाज़ू का अफ़सर मुकर्रर किया गया। मुजाहिदीन ने पहला हमला शेरअली की सड़क पर अंग्रेज़ी फ़ौज पर किया और माल-ओ-असबाब लूट लिया। दूसरा हमला 14 सितम्बर 1857 को शामली पर किया, और फ़तह हासिल की। जब ख़बर आई कि तोपख़ाना सहारनपुर से शामली को भेजा गया है तो हज़रत हाजी साहिब ने मौलाना गंगोही को चालीस-पचास मुजाहिदीन के साथ मुकर्रर किया। सड़क बाग़ के किनारे से गुज़रती थी। मुजाहिदीन उस बाग़ में छिपे थे। जब पलटन वहाँ से गुज़री तो मुजाहिदीन ने एक साथ फ़ायर कर दिया। पलटन घबरा गई और तोपख़ाना छोड़कर भाग गई। इसी मअरके में हाफ़िज़ ज़ामिन साहिब थानवी शहीद हुए। सैयद हसन अस्करी साहिब को सहारनपुर लाकर अंग्रेज़ों ने गोली मार दी। मौलाना रशीद अहमद साहिब गंगोही मुज़फ़्फ़रनगर जेल में डाल दिए गए और मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहिब नानोत्वी आइन्दा की हिक्मत-ए-अमली तय करने के लिए अंडरग्राउंड चले गए।
1857 की जंग-ए-आज़ादी मुख़्तलिफ़ वजूह-ओ-असबाब की बिना पर नाकाम रही और आज़ादी के मुतवल्लों पर हौलनाक मज़ालिम के पहाड़ तोड़ डाले गए। इनमें मुसलमान और बतौर-ए-ख़ास उलमा, अंग्रेज़ों की मश्क-ए-सितम का निशाना बने, इसलिए कि उन्होंने हुकूमत मुसलमानों से छीनी थी और उलमा-ए-किराम ने उनके ख़िलाफ़ फ़तवा देकर जिहाद का इलान-ए-आम कर दिया था। चुनांचे 1857 से चौदह बरस पहले ही गवर्नर जनरल हिंद ने यह कह दिया था कि मुसलमान बुनियादी तौर पर हमारे मुख़ालिफ़ हैं। इस जंग में दो लाख मुसलमानों को शहीद किया गया जिनमें साढ़े इक्यावन हज़ार उलमा-ए-किराम थे। अंग्रेज़ उलमा के इतने दुश्मन थे कि डाढ़ी और लम्बे कुरते वालों को देखते ही फाँसियाँ दे देते थे। एडवर्ड टॉमसन ने शहादत दी है कि सिर्फ़ दिल्ली में पाँच सौ उलमा को फाँसी दी गई। पूरी दिल्ली को मक़तल में तब्दील कर दिया गया था। मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़बान में:
> चौक जिसको कहें वह मक़तल है,
> घर नमूना बना है ज़िंदाँ का।
> शहर दिल्ली का ज़र्रा-ज़र्रा-ए-ख़ाक,
> तिश्ना-ए-ख़ून है हर मुसलमान का।
दिल्ली, कोलकाता, लाहौर, बंबई, पटना, अंबाला, इलाहाबाद, लखनऊ, सहारनपुर, शामली और मुल्क के चुप्पे-चुप्पे में मुसलमान और दूसरे मज़लूम हिन्दुस्तानियों की लाशें नज़र आ रही थीं। उलमा-ए-किराम को ज़िंदा ख़नज़ीर की खालों में सी दिया जाता फिर नज़्र-ए-आतिश कर दिया जाता था। कभी उनके बदन पर ख़नज़ीर की चर्बी मल दी जाती फिर ज़िंदा जला दिया जाता था।
इस जंग में नाकामी की बुनियादी वजह अफ़राद-ओ-वसाइल की क़िल्लत और तंज़ीम की कमी थी। इसलिए अकाबिर-ए-देवबंद ने ग़ौर-ओ-ख़ौज़ के बाद, देवबंद में 1866 में दारुल उलूम देवबंद क़ायम किया। इसका मक़सद जहाँ तालीम-ओ-तअल्लुम था वहीं मुल्क की आज़ादी के लिए अफ़राद-ओ-रिजाल-ए-कार की तैयारी भी थी जो क़ौम और मुल्क की क़ियादत कर सकें, कारवाँ-ए-आज़ादी को कामयाबी के साथ मंज़िल तक पहुँचा सकें। चुनांचे दारुल उलूम के पहले तालिब-ए-इल्म जो फ़िराग़त के बाद दारुल उलूम में उस्ताद और सदरुल मुदर्रिसीन के मंसब-ए-जलील पर फ़ाइज़ हुए, उन्होंने एक मौक़े पर फ़रमाया:
"हज़रतुल उस्ताद (हज़रत नानोत्वी) ने इस मदरसे को क्या दर्स-ए-तदरीस, तालीम-ओ-तअल्लुम के लिए क़ायम किया था? मदरसा मेरे सामने क़ायम हुआ, जहाँ तक मैं जानता हूँ 1857 के हंगामे की नाकामी के बाद यह इरादा क़ायम किया गया ताकि कोई ऐसा मर्कज़ क़ायम किया जाए जिसके ज़ेर-ए-असर लोगों को तैयार किया जाए ताकि 1857 की तलाफ़ी की जा सके।"
मालूम हुआ कि मुल्क की खिदमत और इसकी आज़ादी से हम-किनार करने का जज़्बा दारुल उलूम देवबंद के क़याम के बुनियादी मक़ासिद में शामिल है। इसी तरह जो मदारिस दारुल उलूम के नहज पर बाद में क़ायम किए गए, उनके क़याम के मक़ासिद में भी एक अहम मक़सद यह रहा है कि ऐसे रिजाल-ए-कार और अफ़राद तैयार किए जाएँ जो मुल्क की तामीर-ओ-तरक़्क़ी में मूअस्सिर रोल अदा कर सकें। फिर मुल्क की तामीर-ओ-तरक़्क़ी के लिए वसीओ पैमाने पर जद-ओ-जहद के लिए अकाबिर-ए-दारुल उलूम देवबंद ने **जमीयत उलमाए हिंद** क़ायम की जो दारुल उलूम का सियासी बाज़ू था। अकाबिर-ए-जमीयत ने अवाम में बेदारी की लहर

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