Does God Exist? In Hindi | मुफ़्ती शमाइल नदवी और जावेद अख़्तर का संवाद (डिबेट)
क्या ईश्वर मौजूद है؟
मुफ़्ती शमाइल नदवी और जावेद अख़्तर का संवाद (डिबेट)
इस संवाद के ऐलान के साथ ही इसके आयोजन को लेकर तरह–तरह की राय सामने आईं। हमने भी उन्हें देखा। कुछ लोगों ने इसे गैर-ज़रूरी बताया—यह उनकी सोच हो सकती है। लेकिन कुछ ने तो इसे “शोहरत हासिल करने की कोशिश” तक कह दिया।
सवाल यह है कि ईश्वर के अस्तित्व और उसकी कल्पना के बिना हमारा ईमान कैसा हो सकता है? कोई यह कैसे सोच सकता है कि यह केवल प्रसिद्धि पाने का तरीका है? हाँ, यह हो सकता है कि विषय की गहराई से अनजान होने की वजह से ऐसे विचार पैदा हुए हों।
मुफ़्ती शमाइल नदवी का परिचय पहले ज़्यादा नहीं था, लेकिन कुछ समय पहले हमारे व्हाट्सऐप ग्रुप मरकज़ अल-बुहूस अल-इस्लामिया में उनकी मौजूदगी से थोड़ा परिचय हुआ। यह भी पता चला कि वे बाकायदा नास्तिकता (इल्हाद) के खंडन पर काम कर रहे हैं।
जावेद अख़्तर एक प्रसिद्ध शायर, फ़िल्मी गीतकार और कथाकार हैं। उनकी पूरी ज़िंदगी फ़िल्मी दुनिया में गुज़री है। जो इस पृष्ठभूमि को समझता है, वह जानता है कि धर्म से दूरी बनाना ही उनकी पहचान और उनका औज़ार रहा है।
बॉलीवुड में आम तौर पर धर्म से दूरी रखने का चलन है, लेकिन जिनका नाम मुस्लिम है, उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे खुले तौर पर धर्म-विरोध का प्रदर्शन करें। इसी वजह से वे बहुसंख्यक वर्ग में लोकप्रिय होते हैं, और यही लोकप्रियता उनकी रोज़ी-रोटी बनती है।
कुछ साल पहले एक मशहूर अभिनेता ने उमरा किया, मीडिया ने उसे खूब दिखाया। वापसी पर वे तुरंत एक बड़े मंदिर गए और वहाँ पूरे रीति-रिवाज़ से पूजा की। यही फ़िल्मी दुनिया की सच्चाई है।
इस संवाद की ज़रूरत क्यों थी؟
कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि मुफ़्ती साहब ने बहस की चुनौती क्यों दी। असलियत यह है कि जावेद अख़्तर कई बार ईश्वर के विचार का मज़ाक उड़ाते नज़र आए हैं। इतना ही नहीं, वे ख़ुद भी ईश्वर के अस्तित्व पर बहस की चुनौती देते रहे हैं।
मुफ़्ती शमाइल नदवी ने उस चुनौती को स्वीकार किया—और इसमें कोई ग़लत बात नहीं थी।
इमाम अबुल हसन अशअरी रहमतुल्लाह अलैह के जीवन में आता है कि एक बार उन्होंने बाज़ार में खड़े एक नास्तिक को लोगों का ईमान बिगाड़ते सुना। पहले चुप रहे, फिर जब वह बोल चुका, तो खड़े होकर उसके तर्कों का खंडन किया।
उन्होंने कहा कि अगर पहले ही जवाब दिया जाता, तो लोग समझ नहीं पाते। लेकिन जब ग़लत बात खुलकर कह दी गई, तो चुप रहना मुमकिन नहीं था।
मुफ़्ती शमाइल नदवी का यह कदम भी उसी क़िस्म का है।
संवाद की शुरुआत
मैं ख़ुद इस बहस का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। दो रकअत नमाज़ पढ़कर दुआ की और पूरी बहस शुरू से आख़िर तक सुनी।
मैंने पहली बार मुफ़्ती शमाइल नदवी को सुना—और सुनता ही रह गया। उनकी बातों में गंभीरता, शालीनता, आत्मविश्वास और मज़बूत दलीलें साफ़ दिख रही थीं।
इसके उलट जावेद अख़्तर की भूमिका कमज़ोर लगी। उनकी भूमिका से ही साफ़ हो गया कि वे तर्क से ज़्यादा इधर-उधर की बातें करेंगे।
संचालन (मॉडरेशन) सराहनीय
सौरभ द्विवेदी, जिनसे ज़्यादा उम्मीद नहीं थी, उन्होंने ईमानदारी से बहस का संचालन किया। सवाल-जवाब के दौरान उन्होंने नियमों का सख़्ती से पालन कराया।
अगर नंबर देने हों, तो मैं उन्हें 10 में से 10 दूँगा।
जावेद अख़्तर की एक क़ाबिल-ए-तारीफ़ बात
अगर कुछ सकारात्मक कहना हो, तो “ज़हरीले (मोदी)” शब्द का संदर्भ उनका एक सूक्ष्म संवादात्मक बिंदु था। उन्होंने अच्छे और बुरे में फ़र्क़ करने की कोशिश की—बस यही एक बात उल्लेखनीय थी।
गौहर रज़ा की अनुचित हरकत
सवाल पूछने वालों में गौहर रज़ा भी थे। उन्होंने मुफ़्ती शमाइल की बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जिस पर संचालक ने उन्हें रोक दिया और कहा कि सवाल करें, टिप्पणी नहीं।
क्या नास्तिकों पर कोई प्रमाण की ज़िम्मेदारी नहीं?
जावेद अख़्तर बार-बार कहते रहे कि प्रमाण वही देगा जो ईश्वर को मानता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि इस पूरी दुनिया का अस्तित्व ही ईश्वर के होने की सबसे बड़ी दलील है।
अगर कोई कहता है कि ईश्वर नहीं है, तो उसे बताना होगा कि यह संसार कैसे और क्यों बना।
सवाल-जवाब में मुफ़्ती यासिर नदीम ने उन्हें अच्छी तरह घेरा, लेकिन वे साफ़ जवाब नहीं दे सके।
जावेद अख़्तर की सबसे बड़ी “दलील”
उनकी सबसे बड़ी बात भावनात्मक थी—
“अगर ईश्वर है, तो वह फ़िलिस्तीनी बच्चों की मदद क्यों नहीं करता?”
लेकिन ईश्वर किसी के आदेश का पाबंद नहीं। अगर वह किसी के इशारे पर चले, तो वह ईश्वर ही नहीं रह जाता।
ईश्वर तो वही है जो अपनी हिकमत और इच्छा से काम करता है—और यह बात मुफ़्ती शमाइल ने बार-बार समझाई।
हास्यास्पद स्थिति
जावेद अख़्तर कहते हैं कि वे “पढ़े-लिखे लोगों” की बात मानते हैं, लेकिन वही व्यक्ति मुफ़्ती शमाइल के कुछ अंग्रेज़ी शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाए। यह वैचारिक विरोधाभास था।
निष्कर्ष
मुफ़्ती शमाइल नदवी ने बहुत गंभीर, शैक्षणिक और संतुलित संवाद किया।
आज के दौर में यही तरीक़ा सबसे प्रभावी है। इस बहस ने युवाओं और छात्रों को सोचने और सीखने की दिशा दी।
नास्तिकता आज दुनिया का सबसे बड़ा बौद्धिक संघर्ष है। भारत में इस तरह की यह पहली बहस थी, जो नास्तिकों के हौसले कम करने के लिए काफ़ी है।
दुआ है कि अल्लाह तआला मुफ़्ती शमाइल नदवी और उनकी टीम को बेहतरीन बदला दे, उनके इल्म और अमल में तरक़्क़ी दे और हमें ईमान पर ज़िंदगी और मौत नसीब फ़रमाए।
आमीन।
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