फ्रांसीसी क्रांति : एक ऐतिहासिक भूकंप जिसने विश्व को बदल दिया
फ्रांसीसी क्रांति (1789-1799): एक ऐतिहासिक भूकंप जिसने विश्व को बदल दिया
प्रस्तावना: क्रांति की पृष्ठभूमि
फ्रांसीसी क्रांति केवल एक राष्ट्रीय घटना मात्र नहीं थी, बल्कि मानव इतिहास का एक ऐसा पड़ाव था जिसने राजनीतिक विचारधारा, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों को मौलिक रूप से परिवर्तित कर दिया। यह क्रांति 1789 से 1799 के बीच घटित हुई, परंतु इसकी प्रतिध्वनियाँ आज तक सुनाई देती हैं। "स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व" (Liberté, Égalité, Fraternité) का नारा देने वाली यह क्रांति न केवल फ्रांस के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए आधुनिक लोकतंत्र, मानवाधिकार और राष्ट्रवाद का आधार स्तंभ बन गई।
भाग 1: क्रांति के कारण – एक ज्वालामुखी की तैयारी
1.1 सामाजिक असमानता की विषम संरचना:
प्राचीन शासन (Ancien Régime) के अंतर्गत फ्रांसीसी समाज तीन एस्टेट्स (वर्गों) में विभाजित था:
- **प्रथम एस्टेट:** पादरी वर्ग (लगभग 1-2% जनसंख्या), जो राज्य की भूमि का 10% हिस्सा रखते थे और कोई कर नहीं देते थे।
- **द्वितीय एस्टेट:** कुलीन वर्ग (लगभग 2% जनसंख्या), जो सभी उच्च पदों पर काबिज थे, भूमि का 25% हिस्सा रखते थे और करों से मुक्त थे।
- **तृतीय एस्टेट:** सामान्य जनता (लगभग 97% जनसंख्या), जिसमें किसान, श्रमिक, बुर्जुआ (मध्यम वर्ग) और शहरी गरीब शामिल थे। यह वर्ग सभी करों का भार वहन करता था, परंतु राजनीतिक अधिकारों से वंचित था।
यह व्यवस्था अत्यंत अन्यायपूर्ण थी। किसानों पर तितर (Taille- भूमि कर), गाबेले (नमक कर), टाइथे (गिरजे को दिया जाने वाला धार्मिक कर) और कोरवी (बेगार श्रम) जैसे भारी कर लदे हुए थे।
1.2 आर्थिक संकट:
- **राजकोषीय संकट:** सात वर्षीय युद्ध (1756-63) और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775-83) में फ्रांस की भागीदारी ने राष्ट्रीय खजाने को खाली कर दिया। 1789 तक सरकार का खर्च आय से 20% अधिक हो गया था।
- **दिवालियापन की कगार:** राजा लुई सोलहवें के वित्त मंत्री, जैक्स नेकर और उनके उत्तराधिकारी, अर्थव्यवस्था में सुधार में असफल रहे।
- **कृषि संकट:** 1788-89 में भीषण ठंड और बाढ़ के कारण फसलें बर्बाद हो गईं, जिससे रोटी की कीमतें आसमान छूने लगीं। एक सामान्य श्रमिक की आय का 80-90% हिस्सा केवल रोटी खरीदने में खर्च हो जाता था।
1.3 बौद्धिक जागरण:
- **प्रबोधन युग (Enlightenment)** के विचारकों – **वाल्तेयर** (चर्च और राजशाही की आलोचना), **मॉन्टेस्क्यू** (शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत), **रूसो** (सामान्य इच्छा और लोकप्रिय संप्रभुता) और **डिडरो** – ने पारंपरिक मान्यताओं पर प्रहार किया। उनके विचारों ने जनमानस को तैयार किया कि तर्क, विज्ञान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण संभव है।
1.4 राजनीतिक अक्षमता:
- **लुई सोलहवें** एक कमजोर और निर्णयहीन शासक थे। उनकी पत्नी **मैरी एंटोनेट** ("अगर उन्हें रोटी नहीं मिल रही, तो केक क्यों नहीं खाते?") की फिजूलखर्ची और ऑस्ट्रियाई मूल की होने के कारण अलोकप्रियता ने राजशाही की स्थिति और खराब कर दी।
- **एस्टेट्स-जेनरल का आह्वान:** वित्तीय संकट से निपटने के लिए, लुई सोलहवें को 175 वर्षों के बाद 1789 में एस्टेट्स-जेनरल (तीनों वर्गों की सभा) का आह्वान करना पड़ा। यहीं से क्रांति की वास्तविक शुरुआत हुई।
भाग 2: क्रांति का विस्फोट और प्रारंभिक चरण (1789-1791)
2.1 राष्ट्रीय सभा का गठन (17 जून 1789):
एस्टेट्स-जेनरल में मतदान प्रणाली को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। तृतीय एस्टेट ने मांग की कि सभी सदस्य मिलकर मतदान करें (जिससे उनकी बहुसंख्या प्रभावी हो), न कि प्रत्येक एस्टेट को एक मत। इस मांग के अस्वीकार किए जाने पर, तृतीय एस्टेट ने स्वयं को **राष्ट्रीय सभा (National Assembly)** घोषित कर दिया और शपथ ली कि जब तक फ्रांस के लिए एक संविधान नहीं बन जाता, वे नहीं टूटेंगे (टेनिस कोर्ट की शपथ, 20 जून 1789)।
2.2 बास्तील का पतन (14 जुलाई 1789):
यह घटना फ्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रतीकात्मक और तात्कालिक टर्निंग पॉइंट सिद्ध हुई। पेरिस के लोगों ने हथियारों की तलाश में राजकीय कारागार **बास्तील के किले** पर धावा बोल दिया। यह केवल एक जेल पर कब्जा नहीं था, बल्कि **निरंकुश राजशाही के दमन के प्रतीक** पर विजय थी। इसने पूरे फ्रांस में क्रांतिकारी उत्साह की लहर दौड़ा दी और "ग्रेट फियर" (महान भय) की स्थिति पैदा कर दी, जिसमें किसानों ने जागीरदारों की हवेलियों पर हमले शुरू कर दिए।
2.3 संविधान का निर्माण और सुधार:
राष्ट्रीय सभा ने अगस्त 1789 में **मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा (Declaration of the Rights of Man and of the Citizen)** जारी की। यह दस्तावेज **स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा और अत्याचार के प्रतिरोध** के अधिकारों की गारंटी देता था। इसमें कानून के समक्ष समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और करों के न्यायपूर्ण वितरण का प्रावधान था। यह आधुनिक मानवाधिकार चार्टर की नींव बना।
- **सामंती विशेषाधिकारों का अंत:** 4 अगस्त 1789 की रात को सभा ने सामंती व्यवस्था को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया।
- **नागरिक संविधान:** 1790 में, चर्च की संपत्ति राष्ट्रीयकृत कर ली गई और पादरियों को राज्य के अधीन कर दिया गया, जिससे रोमन कैथोलिक चर्च से मतभेद पैदा हो गए।
- **1791 का संविधान:** इसमें **संवैधानिक राजशाही** की स्थापना की गई, शक्तियों को विभाजित किया गया और सम्पत्तिधारक पुरुषों को मताधिकार दिया गया। लुई सोलहवें ने संविधान को स्वीकार तो किया, परंतु गुप्त रूप से विदेशी शक्तियों से मदद मांगने लगे।
भाग 3: उग्रवाद का दौर और आतंक का राज (1792-1794)
**3.1 राजशाही का पतन और गणतंत्र की स्थापना:**
- **विदेशी युद्ध:** ऑस्ट्रिया और प्रशिया ने फ्रांसीसी क्रांति को कुचलने की धमकी दी। अप्रैल 1792 में फ्रांस ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। "**ला मार्सेइए**" (भविष्य का राष्ट्रगान) इसी उत्साह का प्रतीक था।
- **ट्यूलरीज महल पर आक्रमण (10 अगस्त 1792):** पेरिस के सैन्स-कुलोत्स (गरीब वर्ग) और राष्ट्रीय गार्ड ने राजमहल पर हमला किया। राजपरिवार को कैद कर लिया गया।
- **राष्ट्रीय सम्मेलन और प्रथम गणतंत्र:** नव निर्वाचित **राष्ट्रीय सम्मेलन (National Convention)** ने 21 सितंबर 1792 को **राजशाही का अंत** घोषित किया और **प्रथम फ्रेंच गणतंत्र** की स्थापना की।
3.2 लुई सोलहवें की फांसी (21 जनवरी 1793):
राष्ट्रीय सम्मेलन ने राजा को "राष्ट्र के शत्रु" का दोषी ठहराया और गिलोटीन पर चढ़ा दिया। यह एक साहसिक और विवादास्पद कदम था, जिसने यूरोप की अन्य राजशाहियों को फ्रांस के खिलाफ एकजुट कर दिया।
3.3 आतंक का राज (Reign of Terror, सितंबर 1793-जुलाई 1794):
यह क्रांति का सबसे उग्र और रक्तरंजित चरण था।
- **जैकोबिन क्लब:** **मैक्सिमिलियन रोबेस्पिएरे** के नेतृत्व वाले इस उग्रवादी दल ने नियंत्रण सँभाला।
- **सार्वजनिक सुरक्षा समिति:** इस समिति ने देश पर तानाशाही नियंत्रण स्थापित किया। आंतरिक "शत्रुओं" और "गद्दारों" को कुचलने के नाम पर **क्रांतिकारी न्यायाधिकरण** स्थापित किए गए।
- **गिलोटीन का भय:** हजारों लोगों – राजतंत्रवादियों, संदिग्ध जैकोबिन विरोधियों (जैसे **जिरोंदिस्त** दल), और यहाँ तक कि साधारण नागरिकों को भी – बिना उचित मुकदमे के गिलोटीन पर चढ़ा दिया गया। अनुमानतः **17,000 से 40,000** लोगों की न्यायिक हत्या की गई, जिसमें रानी **मैरी एंटोनेट** भी शामिल थी।
- **नए सुधार:** इस दौरान **दशमिक पंचांग** लागू किया गया, गुलाम प्रथा समाप्त की गई (हालांकि बाद में नेपोलियन ने इसे पुनर्स्थापित किया), और सर्वोच्च सत्ता की आराधना जैसी तर्कवादी पंथों को बढ़ावा दिया गया।
3.4 थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया और आतंक का अंत:
आतंक की नीतियों से थके हुए सम्मेलन के सदस्यों ने **27 जुलाई 1794 (फ्रांसीसी कैलेंडर के अनुसार 9 थर्मिडोर)** को रोबेस्पिएरे और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर गिलोटीन पर चढ़ा दिया। आतंक का राज समाप्त हो गया।
भाग 4: निर्देशिका और क्रांति का अंत (1795-1799)
आतंक के बाद, **मध्यम वर्ग** ने पुनः नियंत्रण सँभाला। **1795 के संविधान** के तहत **पाँच सदस्यीय निर्देशिका (Directory)** की स्थापना की गई। यह शासन भ्रष्टाचार, आर्थिक अस्थिरता और राजनीतिक असफलता से ग्रस्त रहा। जनता अब क्रांतिकारी उत्साह खो चुकी थी और स्थिरता की कामना कर रही थी। इसी शून्य में एक युवा और महत्वाकांक्षी जनरल, **नेपोलियन बोनापार्ट** उभरा, जिसने **18 ब्रूमेर (9 नवंबर 1799)** के तख्तापलट द्वारा निर्देशिका को भंग कर दिया और कंसलशिप की स्थापना की। इसके साथ ही फ्रांसीसी क्रांति का औपचारिक अंत हो गया, और नेपोलियन युग का आरंभ हुआ।
भाग 5: क्रांति के प्रभाव और विरासत
5.1 फ्रांस पर प्रभाव:
- राजशाही और सामंती व्यवस्था का स्थायी रूप से अंत।
- एक **केंद्रीकृत, धर्मनिरपेक्ष राज्य** का उदय।
- समान कानूनी संहिता (नेपोलियनिक कोड का आधार) और राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की नींव पड़ी।
- राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार।
5.2 विश्व पर प्रभाव:
- **यूरोप पर प्रभाव:** नेपोलियन के युद्धों के माध्यम से क्रांतिकारी विचार पूरे यूरोप में फैले, जिसने 19वीं सदी में उदारवादी और राष्ट्रवादी आंदोलनों (1830, 1848 की क्रांतियाँ) को प्रेरित किया।
- **उपनिवेशों पर प्रभाव:** हैती की स्वतंत्रता (1804) इसका सीधा परिणाम थी। भारत सहित अन्य उपनिवेशों में स्वतंत्रता के विचार को बल मिला।
- **आधुनिक राजनीतिक विचारधारा:** **लोकप्रिय संप्रभुता, संवैधानिक सरकार, मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता** के सिद्धांतों को वैश्विक मान्यता मिली।
5.3 विरोधाभास और आलोचनाएँ:
- क्रांति ने "समानता" का नारा दिया, परंतु महिलाओं **(ओलंप द गौजेस)** और गुलामों को पूर्ण अधिकार नहीं मिले।
- "स्वतंत्रता" का आह्वान **आतंक के राज** और नेपोलियन की तानाशाही में तब्दील हो गया।
- हिंसा और रक्तपात को क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए एक आवश्यक बुराई माना गया, जिस पर आज भी नैतिक बहस जारी है।
निष्कर्ष: एक अपूर्ण, परंतु अनिवार्य क्रांति
फ्रांसीसी क्रांति कोई एकल घटना नहीं, बल्कि एक जटिल, बहुआयामी और गतिशील प्रक्रिया थी, जिसमें आदर्शवाद और हिंसा, निर्माण और विनाश, उम्मीद और निराशा साथ-साथ चलते रहे। यह एक **अपूर्ण क्रांति** थी – इसने जिन आदर्शों की घोषणा की, उन्हें पूर्णतः साकार नहीं किया, और अंततः एक सैन्य तानाशाही में समाप्त हुई। तथापि, इसकी **ऐतिहासिक अनिवार्यता** निर्विवाद है। इसने राजा के दैवीय अधिकार के सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि **शासन की वैधता जनता से उत्पन्न होती है**। यह आधुनिक विश्व का जनक है; इसके बिना लोकतंत्र, मानवाधिकार और राष्ट्र-राज्य की अवधारणाएँ वैसी नहीं होतीं, जैसी आज हम जानते हैं। 1789 की आत्मा – न्याय, स्वतंत्रता और मानव गरिमा के लिए संघर्ष – आज भी दुनिया भर में होने वाले सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की प्रेरणा है। फ्रांसीसी क्रांति अतीत नहीं, बल्कि एक सतत वर्तमान है।

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