Iman: Reality and Types In HIndi | ईमान: वास्तविकता और प्रकार
ईमान: वास्तविकता और प्रकार
ईमान का भाषायी अर्थ:
ईमान का भाषायी अर्थ है - सुरक्षा देना, विश्वास करना, किसी को सच्चा मानकर उसकी बात पर यकीन करना आदि।
ईमान का पारिभाषिक एवं शरीयत के अनुसार अर्थ:
नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से दीन की जो बात पक्के तौर पर साबित है, उसे दिल और जान से स्वीकार करना।
ईमान की परिभाषा पर विस्तृत विचार:
ईमान का मतलब यह है कि आप हज़रत (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सच्चा और सत्यापित मानें, आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की रिसालत (पैग़म्बरी) पर दिल से विश्वास रखें और ज़बान से इसकी गवाही व शहादत दें। ईमान की वास्तविकता असल में "दिल से सत्यापन" (तस्दीक़-ए-क़ल्बी) है। रही बात ज़बान से इसका इक़रार करना, तो यह इक़रार सिर्फ इसलिए है ताकि बाह्य रूप से आप पर मुसलमान होने के अहकाम जारी किए जा सकें और यह भी कि ज़बानी इक़रार "दिल के सत्यापन" की निशानी भी है, क्योंकि ज़बान दिल की तर्जुमान (व्याख्याकार) है। हाँ! यह याद रखना चाहिए कि अगर कोई शख्स गूँगा है या ज़बरदस्ती उससे कलिमा कहलाया गया, या फिर ज़बान से इक़रार करने की उसे मोहलत न मिल सकी, लेकिन उसके दिल में तस्दीक़ (सत्यापन) मौजूद था तो ऐसी सभी सूरतों में ज़बानी इक़रार की ज़रूरत नहीं होगी।
"नबरास" शरह "शरह अक़ाइद" में दर्ज है कि:
"बेशक ईमान दिल से सत्यापन है, और इक़रार (ज़बान से स्वीकार) तो दुनिया में अहकाम (धार्मिक नियमों) के जारी करने के लिए शर्त है, जैसे ख़ून और माल की हरामत (पवित्रता), उस पर जनाज़ा की नमाज़ और मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़नाना... तो जिसने दिल से सत्यापन किया और ज़बान से इक़रार नहीं किया, तो वह अल्लाह सुब्हानहु के यहाँ मोमिन है, हालाँकि दुनिया के अहकाम में मोमिन नहीं है।"
(नबरास, शरह "शरह अक़ाइद", पृष्ठ: 520, मौलाना अब्दुल अज़ीज़ परहाड़ी रह.)
ईमान के अंग:
मुहद्दिसीन (हदीस के विद्वान) के यहाँ ईमान के तीन अंग हैं:
1. तस्दीक़ (सत्यापन)
2. इक़रार (स्वीकार)
3. अमल (कर्म)
इसीलिए तो मुहद्दिसीन ईमान की परिभाषा करते हुए कहते हैं कि ईमान दिल से सत्यापन, ज़बान से स्वीकार और अंगों के साथ अमल का नाम है। और हमारा ख़्याल तो यह है कि यह इख़्तिलाफ़ (मतभेद) महज़ लफ़्ज़ी (शाब्दिक) है, इससे ज़्यादा और कुछ नहीं, क्योंकि जो कुछ मुहद्दिसीन कहते हैं, कामिल (पूर्ण) ईमान तो हक़ीक़त में यही है। बे-अमल का ईमान बहरहाल नाक़िस (अधूरा) है, लेकिन इसके बावजूद यह मानना पड़ेगा कि ईमान, दिल के सत्यापन का ही नाम है, आमाल (कर्म) उसकी हक़ीक़त में दाख़िल नहीं, हालाँकि कमाल-ए-ईमान (ईमान की पूर्णता) सलीह आमाल (अच्छे कर्म) ही से वजूद में आता है।
(शेख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रह., "ईमान क्या है?", अनुवादक मौलाना मुहम्मद अन्जर शाह कश्मीरी रह., पृष्ठ: 83)
ईमान के दर्जे:
ईमान के दो दर्जे हैं:
1. ईमान-ए-तहक़ीक़ी (प्रमाण सहित विश्वास)
2. ईमान-ए-तक़लीदी (अनुसरण पर आधारित विश्वास)
ईमान-ए-तहक़ीक़ी यह है कि सभी ईमानियात (विश्वास की बातों) का क़ाइल (मानने वाला) हो और उन्हें दलीलों से साबित भी कर सकता हो। और ईमान-ए-तक़लीदी यह है कि सभी ईमानियात का क़ाइल तो हो, मगर उन्हें दलीलों से साबित नहीं कर सकता। दोनों क़िस्म का ईमान मौतबर (मान्य) है, ताहम ईमान-ए-तहक़ीक़ी, ईमान-ए-तक़लीदी से रुतबे में बढ़कर है।
"अबू हनीफ़ा रह., सुफ़ियान सौरी रह., मालिक रह., औज़ाई रह., शाफ़ई रह., अहमद रह. और आम फ़ुक़हा और अहल-ए-हदीस रहिमहुमुल्लाह तआला ने कहा: उसका ईमान दुरुस्त है, लेकिन वह दलील (प्रमाण) न लाने की वजह से गुनाहगार है। बल्कि कुछ ने इस पर इज्मा (सर्वसम्मति) भी बयान किया है।"
(शरह फ़िक़ह अकबर, पृष्ठ: 143)
ज़रूरियात-ए-दीन (धर्म के अनिवार्य तत्व) पर ईमान:
उन सभी चीज़ों को जो नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से कतईयत (निश्चितता) के साथ साबित हैं, ज़रूरियात-ए-दीन कहा जाता है। मोमिन के लिए इन सभी ज़रूरियात-ए-दीन पर ईमान लाना ज़रूरी है। ज़रूरियात-ए-दीन में से किसी एक के इनकार से आदमी दायरे-ए-इस्लाम से ख़ारिज हो जाता है। ज़रूरियात-ए-दीन बहुत सारी हैं, मिसाल के तौर पर: अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) और उसकी सिफ़ात (गुण) पर ईमान लाना, फ़रिश्तों, आसमानी किताबों, अल्लाह तआला के भेजे हुए रसूलों, क़यामत, तक़्दीर, मौत के बाद ज़िंदा उठाए जाने पर ईमान लाना, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज, जिहाद वग़ैरह अरकान-ए-इस्लाम की फ़र्ज़ियत का क़ाइल होना, सूद, ज़िना, झूठ और फ़राइज़-ए-इस्लाम की अदाएगी न करने की हरामत का क़ाइल होना वग़ैरह। ज़रूरियात-ए-दीन कुछ तफ़्सील के साथ बतलाई गई हैं और कुछ इजमालन (संक्षेप में)। जो ज़रूरियात-ए-दीन तफ़्सील के साथ बतलाई गई हैं उन पर तफ़्सील के साथ ईमान लाना ज़रूरी है, मिसाल के तौर पर नमाज़ पर उसके मुताल्लिक़ बतलाई गई हीयत व कैफ़ियत के साथ ईमान लाना ज़रूरी है। अगर कोई शख्स नमाज़ की फ़र्ज़ियत का तो क़ाइल है, लेकिन उस तफ़्सील के साथ क़ाइल नहीं जो बतलाई गई है तो वह मोमिन नहीं। और जो ज़रूरियात इजमालन बतलाई गई हैं, मिसाल के तौर पर: फ़रिश्तों पर ईमान लाना, साबिक़ा (पिछली) आसमानी किताबों पर ईमान लाना वग़ैरह, तो उन पर इजमालन ईमान लाना काफ़ी है।
(शरह अल-मक़ासिद, जिल्द: 3, पृष्ठ: 420)
ईमान और इस्लाम में फ़र्क़:
ईमान और इस्लाम में कोई फ़र्क़ नहीं, लेकिन इसके बावजूद ईमान से अमूमन दिल का सत्यापन और बातिनी (आंतरिक) हालात मुराद होते हैं और इस्लाम से अक्सर व अज़कर (अधिकतर) ज़ाहिरी इताअत और फ़रमाबरदारी मुराद ली जाती है। इरशाद-ए-बारी तआला है कि:
"आरब (बेदुइन) कहते हैं कि हम ईमान लाए। आप कह दें कि तुम ईमान नहीं लाए, लेकिन तुम कहो कि हम मुसलमान हो गए।"
(सूरह अल-हुजुरात: 14)
मज़कूरह बाला आयत करीमा से वही हक़ीकत सामने आती है जो ऊपर बयान हुई। हासिल इस तफ़्सील का यह है कि जो मुसलमान है वह मोमिन भी है और जो मोमिन है वह मुसलमान भी है। इन दोनों में कोई मुग़ायरत (असमानता) और इख़्तिलाफ़ नहीं।
इमाम कश्मीरी रह. लिखते हैं कि: दिल का सत्यापन जब फूट कर ज़ाहिर (बाहरी अंगों) पर नुमायां हो जाए तो उसका नाम इस्लाम है और इस्लाम जब दिल में उतर जाए तो ईमान के नाम से मुसम्मा (नामित) हो जाता है। इससे मालूम हुआ कि एक ही हक़ीक़त है, लेकिन इख़्तिलाफ-ए-मावातिन (स्थानों के अंतर) से इसके नाम मुख़्तलिफ हो गए और अगर ईमान सिर्फ दिल में ही हो और इस्लाम महज़ अंगों पर नुमायां हो तो यह मुग़ायर हक़ीक़तें हैं, अब इन में इत्तिहाद (एकता) नहीं होगा।
(फ़ैज़ अल-बारी, जिल्द: 1, पृष्ठ: 69)
ईमान का ताल्लुक़ उन चीज़ों से है जिनकी तस्दीक़ (सत्यापन) की जाती है, यानी अक़ाइद (विश्वासों) से। इस्लाम का ताल्लुक़ उन चीज़ों से है जिन्हें अमली तौर पर बजालाया जाता है, यानी आमाल-ए-ज़ाहिरा (बाहरी कर्म): नमाज़, रोज़ा वग़ैरह से। लेकिन क़ुरआन व हदीस में इन का आपस में एक दूसरे पर इत्लाक़ (प्रयोग) भी किया गया है, जिससे मालूम होता है कि शरअन दोनों का मिस्दाक़ (प्रमाणिक उदाहरण) तक़रीबन एक ही है या दोनों एक दूसरे को लाज़िम-मलजूम (अविभाज्य) हैं कि एक के बग़ैर दूसरा नामुकम्मल या ग़ैर मौतबर है।
"अहले सुन्नत वल जमाअत कहते हैं: ईमान इस्लाम से जुदा नहीं है और इस्लाम ईमान में से है। जो मोमिन होगा वह मुसलमान भी होगा और जो मुसलमान होगा वह मोमिन भी होगा, हालाँकि ईमान इस्लाम का ग़ैर (भिन्न) है जैसे पेट पीठ के बग़ैर मुतसव्वर (कल्पित) नहीं है और पीठ पेट के बग़ैर मुतसव्वर नहीं है, हालाँकि वह दोनों एक दूसरे के ग़ैर (भिन्न) हैं। पस ईमान तस्दीक़ (सत्यापन) का नाम है और इस्लाम इन्क़ियाद (आज्ञापालन) का नाम है। तो जो अल्लाह तआला और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तस्दीक़ करने वाला है वह मुसलिम है और जो अल्लाह तआला और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का ताबेदार (आज्ञाकारी) है वह मोमिन है। और मुतज़िला और रवाफ़िज़ (शियाओं) के नज़दीक यह दोनों जुदा हैं।"
(उसूल अद-दीन लिल-बज़दवी रह., पृष्ठ: 54)

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