Irrefutable proofs of the truth of Islam in hindi | इस्लाम धर्म की सच्चाई के अकाट्य प्रमाण
इस्लाम धर्म की सच्चाई के अकाट्य प्रमाण
क़ुरआन मजीद सूरह नंबर 3, आयत नंबर 19 में है: "बेशक अल्लाह तआला के नज़दीक क़ुबूल (स्वीकार्य) दीन सिर्फ़ इस्लाम है।" सूरह नंबर 3, आयत नंबर 85 में है: "दीन इस्लाम के अलावा अन्य सभी अद्यान (धर्म) और मज़ाहिब (पंथ) अल्लाह तआला के नज़दीक नाक़ाबिल-ए-क़ुबूल (अस्वीकार्य) हैं और उनके अनुयायी आख़िरत में नुक़सान उठाने वालों में से (जहन्नुमी) होंगे।" सूरह नंबर 5, आयत नंबर 3 में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि: "आज मैंने दीन इस्लाम को मुकम्मल (पूर्ण) कर दिया और मैं दीन इस्लाम से राज़ी (संतुष्ट) हूँ।" इन आयतों से साबित हुआ कि दीन इस्लाम ही मुकम्मल और अल्लाह तआला का पसन्दीदा दीन है, इसके अलावा दूसरे सभी अद्यान व मज़ाहिब ना-मुकम्मल, मन्सूख़ (रद्द) या बातिल (अमान्य) हैं।
लेकिन अगर कोई क़ुरआन मजीद ही के कलाम-ए-इलाही (ईश्वरीय वचन) होने पर शक करता हो तो ऐसे काफ़िरों को क़ुरआन मजीद की सूरह नंबर 17, आयत नंबर 88 में यह चैलेंज है कि: "(ऐ मुहम्मद!) आप काफ़िरों से कह दीजिए कि अगर सारे इन्सान व जिन्नात (अदृश्य प्राणी) मिलकर इस जैसा क़ुरआन ले आएँ तो नहीं ला सकेंगे, हालाँकि उनमें से कुछ दूसरों से ताअवुन (सहयोग) करें।" जब काफ़िरों ने इस चैलेंज का जवाब नहीं दिया तो अल्लाह तआला ने अपने चैलेंज को थोड़ा हल्का और आसान कर दिया। चुनाँचे सूरह नंबर 11, आयत नंबर 13 और 14 में है कि: "क्या यह (काफ़िर) लोग कहते हैं कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़ुरआन मजीद को अपनी तरफ से बनाया है? तो (ऐ मुहम्मद!) आप उनसे कहिए कि क़ुरआन की तरह दस सूरतें बना कर ले आओ। अगर वह तुम्हारा जवाब न दें तो जान लो कि यह किताब अल्लाह तआला के इल्म (ज्ञान) से नाज़िल (उतारी) की गई है और उसके सिवा कोई दूसरा माबूद (पूज्य) नहीं है, तो क्या तुम इस्लाम क़बूल करने वाले हो?" जब सारे काफ़िर मिलकर दस सूरतें भी क़ुरआन जैसी बना कर न ला सके तो अल्लाह तआला ने आख़िर में क़ुरआन मजीद के एक ही सूरह से चैलेंज कर दिया। चुनाँचे सूरह नंबर 10, आयत नंबर 38 में है कि: "क्या (काफ़िर लोग) कहते हैं कि (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने) क़ुरआन को अपनी तरफ से बना लिया है? तो (ऐ मुहम्मद!) आप उनसे कहिए कि फिर तुम लोग भी क़ुरआन की तरह एक छोटी सी सूरह बना कर ले आओ और अल्लाह के अलावा जिसको चाहो उस ग़रज़ (उद्देश्य) के लिए बुला लो, अगर तुम लोग (अपनी बात में) सच्चे हो।" इसी तरह सूरह नंबर 2, आयत नंबर 23 और 24 में है कि: "(ऐ काफ़िरो!) अगर तुम लोग शक में हो उस क़ुरआन के बारे में जो हमने अपने बन्दे (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर नाज़िल (उतारा) है तो क़ुरआन जैसी एक सूरह बना कर ले आओ और अल्लाह के अलावा अपने मददगारों को भी बुला लो, अगर तुम सच्चे हो। अगर तुम लोग ऐसा न कर पाओ और हरगिज़ कर भी नहीं सकोगे तो फिर अपने आप को उस आग से बचाओ जिसका ईंधन इन्सान और पत्थर हैं जो काफ़िरों के लिए तैयार की गई है।"
आज (1434 हिजरी तक) चौदह सौ साल से ज़्यादा का अर्सा गुज़र गया, लेकिन किसी भी ग़ैर-मुस्लिम ने इस चैलेंज को क़बूल नहीं किया। लिहाज़ा साबित हुआ कि दीन इस्लाम वाक़ई एक सच्चा मज़हब है।
फिर भी अगर दुनिया के ग़ैर-मुस्लिम क़ुरआन मजीद को कलाम-ए-इलाही न मानें तो उनसे गुज़ारिश है कि दुनिया की सारी मज़हबी किताबों और सारे इन्सानों से पूछने की बजाय सिर्फ़ आग और मिट्टी से भी पूछ लें तो साबित हो जाएगा कि वाक़ई सिर्फ़ दीन इस्लाम ही सच्चा मज़हब है और बाक़ी सभी अद्यान व मज़ाहिब मन्सूख़ या बातिल हैं। इसलिए कि हम सब मुसलमान हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर आख़िरी नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तक जिनकी तादाद तक़रीबन एक लाख बीस हज़ार है, हम लोग इन सब पर ईमान रखते हैं और यह मानते हैं कि यह सब अल्लाह तआला के सच्चे बन्दे और उनके पैग़म्बर थे, इसके अलावा यह सब हक़ीक़त में सच्चे मुसलमान थे। जिस की वजह से इन सब की ना'श-ए-मुबारक (पवित्र शरीर) ज़मीन में सदियों से ताज़ा हालत में बग़ैर किसी केमिकल इस्तेमाल किए हुए महफ़ूज़ और सही-ओ-सालिम हैं। जैसा कि "जमअुल फ़वाइद" जिल्द नंबर 1, किताबुस्सलात, हदीस नंबर 1924 में और इसी तरह अबू दाऊद शरीफ़ जिल्द नंबर 1, किताबुस्सलात, अबवाब तफरीउल जुमअह में है कि: "अल्लाह तआला ने ज़मीन को मना कर दिया है कि वह अंबिया-ए-किराम (अलैहिमुस्सलाम) के जिस्मों (शरीरों) को खाए।" इसी तरह तक़रीबन चौदह सौ बत्तीस (1433) सालों में जितने भी मुसलमान मैदान-ए-जंग में या किसी भी मौक़े पर अल्लाह के रास्ते में क़त्ल हुए, उन सब की ना'शें जैसा कि सूरह नंबर 2, आयत नंबर 154 और सूरह नंबर 3, आयत नंबर 169 में है, इसके अलावा सारे सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) और दूसरे सच्चे मोमिनीन व मोमिनात की करोड़ों की तादाद में ना'श-ए-मुबारक ताज़ा हालत में बग़ैर किसी केमिकल इस्तेमाल किए महफ़ूज़ हैं। इनमें से बाज़ के जिस्म में ताज़ा ख़ून और बाज़ की आँखों में रौशनी भी मौजूद है, बल्कि उनमें से बाज़ के जिस्म से ख़ुशबू भी आ रही है। जिस से साबित होता है कि मिट्टी ने भी दीन इस्लाम की सच्चाई पर गवाही दे दी है। क्योंकि किसी भी ग़ैर-मुस्लिम या ग़ैर-मुस्लिम फ़ौजी की लाश ताज़ा हालत में बग़ैर केमिकल इस्तेमाल किए हुए जिसके जिस्म में ताज़ा ख़ून हो, महफ़ूज़ नहीं है, न ही उनमें से किसी के जिस्म से ख़ुशबू आती है। यही नहीं, बल्कि उनकी लाशें मेरा चैलेंज है कि क़यामत तक महफ़ूज़ नहीं रहेंगी। जिस से साबित होता है कि ग़ैर-मुस्लिमों का मज़हब मन्सूख़ या बातिल है। उनकी लाशें इसलिए महफ़ूज़ नहीं रहती हैं कि जब यह लोग कुफ़्र की हालत में मर जाते हैं तो उन पर अल्लाह तआला, फ़रिश्ते और सारे इन्सानों की लानत होती है और यह लोग अज़ाब में मुब्तिला (ग्रस्त) हो जाते हैं, जैसा कि सूरह नंबर 2, आयत नंबर 161 और 162 में है। लिहाज़ा जब ग़ैर-मुस्लिम कुफ़्र पर मरते हैं तो लानत और अज़ाब में गिरफ़्तार हो जाते हैं, तो फिर उनकी लाशें ताज़ा हालत में ताज़ा ख़ून के साथ कैसे महफ़ूज़ रह सकती हैं? और उनके जिस्म से ख़ुशबू कैसे आ सकती है?
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का वाक़िया क़ुरआन मजीद सूरह नंबर 21, आयत नंबर 51 से 70 तक में है कि उनको नमरूद बादशाह (जो काफ़िर था) ने आग में डाल दिया था, मगर वह नहीं जले थे और अल्लाह के हुक्म से वह आग सलामती के साथ ठंडी हो गई थी। हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपनी तफ़सीर "बयानुल क़ुरआन" में लिखा है कि दूसरे बुज़ुर्गान-ए-दीन के बारे में भी सबूत है कि वह आग में नहीं जले थे। इसके अलावा मेरे पास भी हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी (रहमतुल्लाह अलैह) और उनके रूहानी उस्ताद हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी (रहमतुल्लाह अलैह) के बारे में सबूत मौजूद है कि यह दोनों भी आग में नहीं जले थे, बल्कि आज भी ऐसे मुसलमान दुनिया में मौजूद हैं जो बहुक्म-ए-इलाही (ईश्वरीय आदेश से) बग़ैर केमिकल इस्तेमाल किए आग में नहीं जल सकते हैं। जिस से दीन इस्लाम की सच्चाई पर आग की गवाही का सबूत मिलता है, क्योंकि कोई भी ग़ैर-मुस्लिम बग़ैर केमिकल इस्तेमाल किए आग में जलने से महफ़ूज़ नहीं रह सकता। इस बिना पर अगर कोई क़ुरआन की बातों को न माने तब भी आग और मिट्टी की गवाही से साबित हो जाता है कि वाक़ई दीन इस्लाम ही सच्चा मज़हब है और दूसरे सभी अद्यान व मज़ाहिब मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने से मन्सूख़ या बातिल हैं।
आख़िर में मेरी दुआ है कि अल्लाह तआला इस तहरीर (लेख) से मुसलमानों के ईमान व यक़ीन को मज़बूत करे, ताकि सब के सब दीन इस्लाम में मुकम्मल तौर पर दाख़िल हो जाएँ और जो ग़ैर-मुस्लिम हैं, अल्लाह तआला उन्हें भी दीन इस्लाम में दाख़िल होने की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) दे। आमीन।

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