अल्लाह की तौहीद : क़ुरआन की रौशनी में

अल्लाह की तौहीद  : क़ुरआन की रौशनी में

 

अल्लाह की तौहीद : क़ुरआन की रौशनी में Allah ki tauheed quran majeed mein

(1)﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ ﴾ [البقرة: 255]

(1) अल्लाह, उसके सिवा कोई माबूद नहीं, जो हमेशा ज़िंदा रहने वाला, सबको संभालने वाला है। न उसे ऊँघ आती है और न ही नींद। आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है वह जो उसके यहाँ उसकी इजाज़त के बग़ैर सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ लोगों के सामने है और जो कुछ उनसे छिपा हुआ है। और वह उसके इल्म की किसी चीज़ का इहाता नहीं कर सकते, बल्कि जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी (शासन) सारे आसमानों और ज़मीन को घेरे हुए है, और उसे उनकी हिफ़ाज़त किसी तरह की थकान नहीं देती। और वह बहुत ऊँचा, बहुत बड़ा है। (सूरत अल-बक़रा: 255)

 

अल्लाह के सिवा कोई हक़ीक़ी माबूद नहीं। उसके सिवा कोई नफ़ा-नुक़सान का मालिक नहीं। उसके सिवा कोई देने और रोकने वाला नहीं। उसके दीन के सिवा कोई दीन क़ुबूल नहीं। उसके हुक्म के सिवा कोई हुक्म और दस्तूर नहीं।

 

(2)﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُ ﴾ [آل عمران: 2]

(2) अल्लाह, उसके सिवा कोई माबूद नहीं, हमेशा ज़िंदा रहने वाला, सबको संभालने वाला। (सूरत आले इमरान: 2)

 

क़य्यूम का क्या मतलब है? क़य्यूम के मायने हैं: जो अपने आप से क़ाएम है, दूसरों से बे-नियाज़ है, और हर चीज़ उसकी मुहताज है।

 (3)﴿قُلِ ٱللَّهُمَّ مَٰلِكَ ٱلۡمُلۡكِ تُؤۡتِي ٱلۡمُلۡكَ مَن تَشَآءُ وَتَنزِعُ ٱلۡمُلۡكَ مِمَّن تَشَآءُ وَتُعِزُّ مَن تَشَآءُ وَتُذِلُّ مَن تَشَآءُۖ بِيَدِكَ ٱلۡخَيۡرُۖ إِنَّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ ﴾ [آل عمران: 26]

(3) (ऐ रसूल) तुम कह दो: ऐ अल्लाह! सारी बादशाही के मालिक! तू जिसे चाहे बादशाही दे और जिससे चाहे बादशाही छीन ले। तू जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत दे। भलाई तेरे ही हाथ में है। बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है। (सूरत आले इमरान: 26)


(4)﴿قُلۡ إِنِّي نُهِيتُ أَنۡ أَعۡبُدَ ٱلَّذِينَ تَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِۚ قُل لَّآ أَتَّبِعُ أَهۡوَآءَكُمۡ قَدۡ ضَلَلۡتُ إِذٗا وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلۡمُهۡتَدِينَ ﴾ [الأنعام: 56] 

(4) (ऐ नबी) कह दो: मुझे इस बात से रोका गया है कि मैं अल्लाह के सिवा उनकी इबादत करूँ जिन्हें तुम पूजते हो। कह दो कि मैं तुम्हारी ख़्वाहिशों की पैरवी नहीं करूँगा, वरना मैं गुमराह हो जाऊँगा और मैं हिदायत पाए हुओं में नहीं रहूँगा। (सूरत अल-अनआम: 56)

 

(5)﴿قُلۡ إِنَّنِي هَدَىٰنِي رَبِّيٓ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ دِينٗا قِيَمٗا مِّلَّةَ إِبۡرَٰهِيمَ حَنِيفٗاۚ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ﴾ [الأنعام: 161]

(5) कह दो: बेशक मेरे रब ने मुझे सीधे रास्ते की हिदायत दी है, एक सही दीन, इबराहीम की मिल्लत की तरफ, जो एक ओर झुकने वाले थे, और वह मुशरिकों में से नहीं थे। (सूरत अल-अनआम: 161)

 

(6)﴿لَا شَرِيكَ لَهُۥۖ وَبِذَٰلِكَ أُمِرۡتُ وَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلۡمُسۡلِمِينَ ﴾ [الأنعام: 163]

(6) उसका कोई शरीक नहीं, और मुझे तो बस यही हुक्म मिला है और मैं सबसे पहला मुसलमान हूँ। (सूरत अल-अनआम: 163)

 

(7)﴿قُلۡ أَغَيۡرَ ٱللَّهِ أَبۡغِي رَبّٗا وَهُوَ رَبُّ كُلِّ شَيۡءٖۚ وَلَا تَكۡسِبُ كُلُّ نَفۡسٍ إِلَّا عَلَيۡهَاۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٞ وِزۡرَ أُخۡرَىٰۚ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرۡجِعُكُمۡ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ فِيهِ تَخۡتَلِفُونَ ﴾ [الأنعام: 164]

(7) कह दो: क्या मैं अल्लाह के सिवा किसी और को रब बनाऊँ, हालाँकि वह हर चीज़ का रब है? और हर शख़्स जो कुछ करता है उसका वह ख़ुद ही ज़िम्मेदार है। कोई भी दूसरे के बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम्हें अपने रब की तरफ लौटना है, फिर वह तुम्हें उन बातों की ख़बर देगा जिनमें तुम इख़्तिलाफ़ करते थे। (सूरत अल-अनआम: 164)

 

क्या कोई इंसान अपने ख़ालिक़ की इबादत छोड़ कर अपने जैसी किसी मख़्लूक़ की इबादत कर सकता है? कोई भी अक़्लमंद ऐसा नहीं कर सकता।

 

(8)﴿فَذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمُ ٱلۡحَقُّۖ فَمَاذَا بَعۡدَ ٱلۡحَقِّ إِلَّا ٱلضَّلَٰلُۖ فَأَنَّىٰ تُصۡرَفُونَ ﴾ [يونس: 32]

(8) तो वही अल्लाह तुम्हारा हक़ीक़ी रब है। फिर हक़ के बाद सिवाय गुमराही के और क्या है? तो तुम किधर मुड़े जा रहे हो? (सूरत यूनुस: 32)

 

(9)﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِن كُنتُمۡ فِي شَكّٖ مِّن دِينِي فَلَآ أَعۡبُدُ ٱلَّذِينَ تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَٰكِنۡ أَعۡبُدُ ٱللَّهَ ٱلَّذِي يَتَوَفَّىٰكُمۡۖ وَأُمِرۡتُ أَنۡ أَكُونَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴾ [يونس: 104]

(9) (ऐ नबी) कह दो: ऐ लोगो! अगर तुम्हें मेरे दीन के बारे में शक है, तो (सुन लो कि) मैं उनकी इबादत नहीं करता जिनकी तुम अल्लाह के सिवा इबादत करते हो। बल्कि मैं उस अल्लाह की इबादत करता हूँ जो तुम्हारी जान लेता है, और मुझे हुक्म हुआ है कि मैं ईमान वालों में से रहूँ। (सूरत यूनुस: 104)

 

(10)﴿وَأَنۡ أَقِمۡ وَجۡهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفٗا وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ﴾ [يونس: 105]

(10) और यह कि तुम अपना रुख़ दीन की तरफ स्थिर रखो, शिर्क से हटकर, और तुम हरगिज़ मुशरिकों में से न होना। (सूरत यूनुस: 105)

 

(11)﴿۞ وَقَالَ ٱللَّهُ لَا تَتَّخِذُوٓاْ إِلَٰهَيۡنِ ٱثۡنَيۡنِۖ إِنَّمَا هُوَ إِلَٰهٞ وَٰحِدٞ فَإِيَّٰيَ فَٱرۡهَبُونِ ﴾ [النحل: 51]

(11) और अल्लाह ने कहा: मेरे सिवा दो माबूद न बनाओ। वह तो बस एक ही इलाह है। तो बस मुझी से डरो। (सूरत अन-नह्ल: 51)

 

(12)﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ ٱلۡعَرۡشِ ٱلۡعَظِيمِ۩ ﴾ [النمل: 26]

(12) अल्लाह, उसके सिवा कोई माबूद नहीं, वह बड़े अर्श का रब है। (सूरत अन-नम्ल: 26)

 

(13)﴿إِنَّ إِلَٰهَكُمۡ لَوَٰحِدٞ ﴾ [الصافات: 4]

(13) बेशक तुम्हारा माबूद एक ही है। (सूरत अस-साफ़्फ़ात: 4)

 

(14)﴿وَهُوَ ٱلَّذِي فِي ٱلسَّمَآءِ إِلَٰهٞ وَفِي ٱلۡأَرۡضِ إِلَٰهٞۚ وَهُوَ ٱلۡحَكِيمُ ٱلۡعَلِيمُ ﴾ [الزخرف: 84]

(14) और वही है जो आसमान में भी माबूद है और ज़मीन में भी माबूद है। और वह हिकमत वाला, इल्म वाला है। (सूरत अज़-ज़ुख़रुफ़: 84)

 

(15)﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ﴾ [التغابن: 13]

(15) अल्लाह, उसके सिवा कोई माबूद नहीं। और ईमान वालों को चाहिए कि वह अल्लाह ही पर भरोसा करें। (सूरत अत-तग़ाबुन: 13)

 

(16)﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلۡكَٰفِرُونَ ،لَآ أَعۡبُدُ مَا تَعۡبُدُونَ ،وَلَآ أَنتُمۡ عَٰبِدُونَ مَآ أَعۡبُدُ،وَلَآ أَنَا۠ عَابِدٞ مَّا عَبَدتُّمۡ،وَلَآ أَنتُمۡ عَٰبِدُونَ مَآ أَعۡبُدُ ،لَكُمۡ دِينُكُمۡ وَلِيَ دِينِ ﴾ (سورۃ الکافرون)

(16) (ऐ नबी) कह दो: ऐ काफ़िरो! मैं इबादत नहीं करता उनकी जिनकी तुम इबादत करते हो। और न तुम इबादत करने वाले हो उसकी जिसकी मैं इबादत करता हूँ। और न मैं इबादत करने वाला हूँ उनकी जिनकी तुम इबादत करते हो। और न तुम इबादत करने वाले हो उसकी जिसकी मैं इबादत करता हूँ। तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और मेरे लिए मेरा दीन। (सूरत अल-काफ़िरून)

 

(17)﴿قُلۡ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ،ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ ،لَمۡ يَلِدۡ وَلَمۡ يُولَدۡ ،وَلَمۡ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدُۢ ﴾ [الإخلاص]

(17) कह दो: वह अल्लाह एक है। अल्लाह बे-नियाज़ है। न उसने किसी को जना और न वह किसी से जन्मा। और कोई भी उसका हमसर नहीं है। (सूरत अल-इख़्लास)

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