रजब के कूंडों की शरई हैसियत और इस्लामी हुक्म
रजब के कूंडों की शरई हैसियत और इस्लामी हुक्म
हज़रत मौलाना मुफ़्ती महमूद हसन साहब गंगोही रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं:
"कोंडों की मरूज रस्म मज़हब अहले सुन्नत वल जमात में महज़ बे-अस्ल, खिलाफ़-ए-शरअ और बिदअत-ए-ममनूआ है। क्योंकि बाईसवीं रजब न हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रहमतुल्लाह अलैह की तारीख-ए-पैदाइश है और न तारीख-ए-वफात। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रहमतुल्लाह अलैह की विलादत 8 रमज़ान 80 हिजरी या 83 हिजरी में हुई और वफात शव्वाल 148 हिजरी में हुई। फिर बाईसवीं रजब की तख़सीस क्या है? और इस तारीख को हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रहमतुल्लाह अलैह से क्या ख़ास मुनासिबत है? हाँ, बाईसवीं रजब हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की तारीख-ए-वफात है (देखो तारीख तबरानी, ज़िक्र-ए-वफात-ए-मुआविया)। इससे ज़ाहिर होता है कि इस रस्म को महज़ पर्दा-पोशी के लिए हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रहमतुल्लाह अलैह की तरफ मंसूब किया गया, और न दर-हक़ीक़त यह तक़रीब हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की वफात की ख़ुशी में मनाई जाती है।
जिस वक़्त यह रस्म ईजाद हुई, अहले सुन्नत वल जमात का ग़लबा था, इसलिए यह इंतज़ाम किया गया कि शीरनी बतौर-ए-हिस्सा इलानिया न तक़सीम की जाए, ताकि राज़ फ़ाश न हो, बल्कि दुश्मानान-ए-हज़रत मुआविया ख़ामोशी के साथ एक दूसरे के यहाँ जाकर उसी जगह यह शीरनी खा लें जहाँ उसको रखा गया है, और इस तरह अपनी ख़ुशी व मसर्रत एक दूसरे पर ज़ाहिर करें।
जब कुछ इसका चर्चा हुआ तो इसको हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रहमतुल्लाह अलैह की तरफ मंसूब करके यह तोहमत इमाम मौसूफ़ पर लगाई कि उन्होंने ख़ुद ख़ास इस तारीख में अपनी फातिहा का हुक्म दिया है, हालाँकि यह सब मन-घढ़त बातें हैं। लिहाज़ा बरादरान-ए-अहले सुन्नत को इस रस्म से बहुत दूर रहना चाहिए, न ख़ुद इस रस्म को बजा लाएँ और न इसमें शिरकत करें।
फ़क़त वल्लाह सुब्हानहू तआला आ'लम।"
(फ़तावा महमूदिया, जिल्द 3, पृष्ठ 281-282, बाब अल-बिदअत व अर-रसूम, तबअ फ़ारूक़िया)

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