औरंगजेब आलमगीर: एक महान रणनीतिकार और राजनेता
औरंगजेब आलमगीर: एक महान रणनीतिकार और राजनेता
परिचय: एक ऐसा शासक जो इतिहास के पन्नों में आज भी धड़कता है
मुगल साम्राज्य के छठे बादशाह, अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर का नाम भारतीय इतिहास के सबसे चमकदार और सबसे विवादित अध्यायों में से एक है। उनका 1658 से 1707 तक का लगभग 49 वर्षों का शासनकाल, मुगल साम्राज्य की चरम सीमा और उसके पतन की नींव दोनों का साक्षी रहा। वह एक ऐसे शासक थे जिनके बारे में एक ओर कहा जाता है कि उन्होंने इस्लामी कानून को कठोरता से लागू करने की कोशिश की, गैर-मुस्लिमों पर जज़िया कर फिर से लगाया और कई मंदिरों को नष्ट किया। वहीं दूसरी ओर, उन्हें एक अत्यंत कर्तव्यपरायण, अनुशासित, न्यायप्रिय और कुशल प्रशासक के रूप में भी याद किया जाता है, जिन्होंने साम्राज्य को उसकी अधिकतम भौगोलिक सीमा तक पहुँचाया। औरंगज़ेब की इस द्वंद्वात्मक छवि का अध्ययन केवल एक शासक का मूल्यांकन नहीं, बल्कि 17वीं सदी के भारत के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक ताने-बाने को समझने का प्रयास है। यह निबंध औरंगज़ेब के जीवन, शासन, नीतियों, उपलब्धियों और विवादों का एक संतुलित, गहन और विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा, ताकि इस महान और जटिल ऐतिहासिक पात्र को बहुआयामी दृष्टिकोण से देखा जा सके।
अध्याय 1: प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व का निर्माण (1618-1658)
औरंगज़ेब का जन्म 3 नवंबर, 1618 को गुजरात के दाहोद नगर में हुआ था। वह मुगल बादशाह शाहजहाँ और उनकी प्रिय बेगम मुमताज़ महल की तीसरी संतान थे। उनका पूरा नाम अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब था, जिसमें 'औरंगज़ेब' का अर्थ है "सिंहासन की शोभा", और बाद में उन्होंने 'आलमगीर' (विश्व-विजेता) की उपाधि धारण की।
बचपन से ही औरंगज़ेब गंभीर, विचारशील और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा दरबार के उत्कृष्ट विद्वानों के मार्गदर्शन में हुई। उन्होंने अरबी, फारसी, तुर्की भाषाओं में निपुणता हासिल की और कुरान, हदीस, इस्लामी न्यायशास्त्र (फिक़्ह) तथा धर्मशास्त्र का गहन अध्ययन किया। साथ ही, एक राजकुमार के रूप में उन्होंने सैन्य कौशल, युद्धनीति, घुड़सवारी और तलवारबाजी में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनके प्रमुख शिक्षकों में मौलाना मीर मुहम्मद हाशिम और मौलाना अब्दुल लतीफ़ शामिल थे, जिन्होंने उनके चरित्र में धार्मिक गंभीरता और नैतिक सख़्ती की आधारशिला रखी।
उनके व्यक्तित्व की कई विशेषताएँ बचपन में ही उजागर होने लगी थीं। अपने भाइयों, विशेषकर दारा शिकोह जो कि सूफी विचारधारा और हिंदू-मुस्लिम एकता में रुचि रखते थे, के विपरीत औरंगज़ेब का झुकाव रूढ़िवादी इस्लामी सिद्धांतों की ओर था। वह सादगी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा को महत्व देते थे। युवावस्था में ही उन्हें विभिन्न प्रशासनिक पदों और सूबों की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1636 में उन्हें दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया और स्थानीय राजनीति को करीब से समझा। बाद में उन्हें गुजरात, मुल्तान, सिंध और अफगानिस्तान के सीमांत क्षेत्रों का भी प्रशासन सौंपा गया। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने न्यायप्रियता, कुशल प्रबंधन और सैन्य रणनीति के गुणों का परिचय दिया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा एक सक्षम शासक के रूप में स्थापित हुई।
उनके चरित्र का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी धार्मिक निष्ठा थी। वह नियमित रूप से नमाज़ पढ़ते, रोज़े रखते और कुरान की तिलावत करते थे। उन्होंने अपने हाथों से टोपियाँ सिलकर और कुरान की प्रतियाँ लिखकर भी जीवनयापन किया, जो उनकी सादगी और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। यह धार्मिक गंभीरता ही बाद में उनकी राजनीतिक नीतियों का एक केंद्रीय आधार बनी।
अध्याय 2: सिंहासन के लिए संघर्ष: उत्तराधिकार का युद्ध (1657-1658)
1657 में जब बादशाह शाहजहाँ गंभीर रूप से बीमार पड़े, तो मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार के लिए एक कड़ा संघर्ष छिड़ गया। शाहजहाँ के चार पुत्र – दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगज़ेब और मुराद बख्श – सभी अपने-अपने सूबों में सशक्त थे और सिंहासन के दावेदार थे। यह संघर्ष केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि विचारधाराओं का भी टकराव था।
1. **दारा शिकोह:** सबसे बड़े पुत्र होने के नाते उन्हें उत्तराधिकारी माना जाता था। वह उदार विचारों के, सूफी मत के अनुयायी और हिंदू-मुस्लिम सामंजस्य में विश्वास रखते थे। उन्होंने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद ("सिर्र-ए-अकबर") करवाया। हालाँकि, वह एक कुशल सेनानायक या चतुर राजनीतिज्ञ नहीं थे।
2. **शाह शुजा:** बंगाल का सूबेदार था। महत्वाकांक्षी तो था, लेकिन औरंगज़ेब जितना सक्षम नहीं।
3. **मुराद बख्श:** गुजरात का सूबेदार। एक बहादुर सैनिक था, लेकिन अदूरदर्शी और भोग-विलास में डूबा हुआ।
4. **औरंगज़ेब:** दक्कन का सूबेदार। अनुशासित, धार्मिक, कूटनीतिक और एक उत्कृष्ट सैनिक व प्रशासक।
उत्तराधिकार के इस युद्ध में कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ी गईं:
* **धरमट की लड़ाई (अप्रैल 1658):** औरंगज़ेब और मुराद बख्श की संयुक्त सेना ने शाहजहाँ द्वारा भेजी गई महाराजा जसवंत सिंह और कासिम खान की सेना को हराया।
* **सामूगढ़ की लड़ाई (29 मई 1658):** यह निर्णायक युद्ध था। औरंगज़ेब और मुराद बख्श ने दारा शिकोह की सेना को करारी हार दी। दारा पीछे हट गया।
* **खजवा/खजुहा की लड़ाई (जनवरी 1659):** औरंगज़ेब ने बंगाल से आए शाह शुजा को पराजित किया।
* **देवराई की लड़ाई (मार्च-अप्रैल 1659):** औरंगज़ेब ने एक बार फिर दारा शिकोह को हराया, जिसके बाद दारा पकड़ा गया और उसकी हत्या कर दी गई।
इस संघर्ष में औरंगज़ेब की सफलता के कई कारण थे:
* **श्रेष्ठ सैन्य रणनीति और नेतृत्व।**
* **कुशल कूटनीति:** उसने मुराद बख्श से अस्थायी गठबंधन किया, फिर उसे मारकर सत्ता पर एकाधिकार कर लिया।
* **धन और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन।**
* **सैनिकों का विश्वास और निष्ठा।**
* **प्रचार का कुशल उपयोग:** उसने खुद को इस्लाम का रक्षक और एक न्यायप्रिय शासक के रूप में पेश किया, जबकि दारा को धर्मभ्रष्ट बताया।
31 जुलाई, 1658 को औरंगज़ेब ने खुद को "आलमगीर" (दुनिया को जीतने वाला) की उपाधि के साथ बादशाह घोषित किया और आगरा के किले में आधिकारिक रूप से सिंहासन पर बैठा। उसने अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के किले में नजरबंद कर दिया, जहाँ 1666 में उनकी मृत्यु हो गई।
अध्याय 3: शासन व्यवस्था और प्रशासनिक ढाँचा
औरंगज़ेब की शासन व्यवस्था उनके व्यक्तित्व की तरह ही कठोर, अनुशासित और कुशल थी। उनका मानना था कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि (नायब) है और उसका प्रमुख कर्तव्य प्रजा के बीच न्याय (अद्ल) स्थापित करना है।
1. केंद्रीय प्रशासन:
* **वजीर/दीवान:** वित्त और राजस्व का प्रमुख मंत्री। औरंगज़ेब के समय में जफर खान, असद खान जैसे कुशल वजीर थे।
* **मीर बख्शी:** सैन्य विभाग का प्रमुख। सेना की भर्ती, वेतन और अनुशासन का जिम्मा।
* **सद्र-उस-सुदूर:** धार्मिक मामलों, दान और न्यायालयों का प्रमुख।
* **खान-ए-सामा:** घरेलू विभाग का प्रमुख।
2. प्रांतीय प्रशासन:
साम्राज्य को कई सूबों (प्रांतों) में बाँटा गया था, जिन पर एक सूबेदार (गवर्नर) होता था। उसके नीचे दीवान (राजस्व), बख्शी (सैन्य), सद्र (धार्मिक) और कोतवाल (कानून-व्यवस्था, नगर प्रशासन) होते थे। औरंगज़ेब ने सूबेदारों पर कड़ी नजर रखी और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई की।
3. राजस्व व्यवस्था:
* **जमींदारी प्रणाली:** भू-राजस्व राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। औरंगज़ेब ने राजस्व दरों को कुछ कम किया, खासकर दक्कन जैसे कम उपजाऊ इलाकों में। हालाँकि, लगातार युद्धों के कारण वास्तविक कर बोझ अधिक रहा।
* **जकात:** मुसलमानों पर लगने वाला धार्मिक कर।
* **जज़िया:** गैर-मुस्लिमों (मुख्यतः हिंदू) पर लगाया जाने वाला कर। इसके पीछे औरंगज़ेब का तर्क था कि यह उनकी सुरक्षा के बदले लिया जाता है और उन्हें सैन्य सेवा से मुक्त रखता है। यह नीति सबसे विवादास्पद साबित हुई।
4. न्यायिक व्यवस्था:
औरंगज़ेब ने इस्लामी कानून (शरिया) को लागू करने पर बल दिया। काजी (न्यायाधीश) और मुफ्ती (धर्मसलाहकार) न्यायालयों में नियुक्त थे। बादशाह स्वयं भी न्याय करते थे और लोगों की शिकायतें सुनते थे। उन्होंने "फतवा-ए-आलमगीरी" नामक एक विशाल इस्लामी कानून संग्रह की सम्पादन भी करवाई, जो एक प्रमुख कार्य था।
5. सैन्य व्यवस्था:
मुगल सेना मनसबदारी प्रथा पर आधारित थी। औरंगज़ेब ने सेना का विस्तार किया, विशेषकर दक्षिण के युद्धों के लिए। हालाँकि, लंबे युद्धों ने राजकोष पर भारी दबाव डाला और सेना की कुशलता पर भी असर पड़ा।
औरंगज़ेब स्वयं एक अत्यंत मेहनती शासक थे। कहा जाता है कि वह रात के अधिकांश समय पढ़ने-लिखने और राजकाज में बिताते थे। उन्होंने एक निजी डायरी (रुज़नामचा) भी लिखी, जिससे उनके विचारों और दैनिक कार्यक्रम का पता चलता है।
अध्याय 4: धार्मिक नीतियाँ: विवाद का केंद्रबिंदु
औरंगज़ेब की धार्मिक नीतियाँ उनके शासनकाल के सबसे अधिक चर्चित और आलोचित पहलू हैं। इन्हें समझने के लिए उनकी व्यक्तिगत आस्था और राजनीतिक उद्देश्यों के बीच के संबंध को देखना जरूरी है।
1. व्यक्तिगत धार्मिकता:
औरंगज़ेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। वह नियमित नमाजी थे, रोज़े रखते थे और हर हाल में इस्लामी रीति-रिवाजों का पालन करते थे। उन्होंने दरबार में गाने-बजाने, चित्रकारी और अन्य "अनैतिक" गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया। उनकी सादगी प्रसिद्ध थी; वह साधारण कपड़े पहनते, हाथ से टोपी सिलते और कुरान की नकल करके पैसे कमाते थे।
2. जज़िया कर का पुनर्लगान (1679):
यह औरंगज़ेब की सबसे विवादास्पद नीति थी। जज़िया एक ऐसा कर था जो गैर-मुस्लिम प्रजा (ज़िम्मी) से उनकी सुरक्षा और धार्मिक स्वायत्तता के बदले में लिया जाता था। अकबर ने इसे समाप्त कर दिया था। औरंगज़ेब ने 1679 में इसे फिर से लागू किया।
* **तर्क:** औरंगज़ेब का कहना था कि यह इस्लामी कानून का हिस्सा है, यह गैर-मुस्लिमों को सैन्य सेवा से मुक्त रखता है, और राजकोष की आय बढ़ाता है।
* **प्रभाव:** हिंदू जनता और राजपूत सामंतों में व्यापक असंतोष फैला। जयपुर के महाराजा जसवंत सिंह ने इसका विरोध किया। कई इतिहासकार मानते हैं कि इसने हिंदू-मुस्लिम संबंधों में दरार पैदा की और साम्राज्य के प्रति निष्ठा को कमजोर किया।
3. मंदिरों की मरम्मत एवं विध्वंस:
यह सबसे संवेदनशील मुद्दा है। कुछ तथ्य स्पष्ट हैं:
* औरंगज़ेब ने **कई मंदिरों के विध्वंस का आदेश दिया**, जैसे काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी), केशव राय मंदिर (मथुरा), और सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को रोका।
* **कारण:** ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि अधिकांश विध्वंस **राजनीतिक विद्रोहों को दबाने** या **सैन्य रणनीति** के तहत किए गए। उदाहरण के लिए, मथुरा के जाट विद्रोह के दमन के बाद वहाँ के मंदिर तोड़े गए। यह केवल धार्मिक उन्माद नहीं था।
* **दूसरी तस्वीर:** हैरानी की बात यह है कि औरंगज़ेब ने **कई हिंदू मंदिरों और मठों को भूमि अनुदान (जागीर) भी दिए**। बनारस, गुजरात, मालवा आदि में सैकड़ों मंदिरों को उनके शासनकाल में सुरक्षा प्राप्त थी और वे संपन्न थे। उन्होंने कई हिंदू त्योहारों पर दान भी दिया।
* **निष्कर्ष:** यह कहना एकतरफा होगा कि औरंगज़ेब ने सभी मंदिर तोड़ दिए। उनकी नीति चयनात्मक और राजनीतिक थी। विद्रोही क्षेत्रों में मंदिरों को निशाना बनाया गया, जबकि शांत क्षेत्रों में उन्हें संरक्षण दिया गया।
4. गैर-मुस्लिमों के साथ व्यवहार:
औरंगज़ेब के दरबार में बड़ी संख्या में हिंदू अमीर और सेनापति थे। राजा जय सिंह, महाराजा जसवंत सिंह, मिर्जा राजा जय सिंह जैसे हिंदू राजपूत उनकी सेना के स्तंभ थे। उन्होंने राजपूतों से वैवाहिक संबंध भी बनाए रखे। हालाँकि, मारवाड़ और मेवाड़ के साथ संघर्ष (1679 के बाद) ने राजपूत-मुगल गठबंधन को कमजोर कर दिया।
5. अन्य धार्मिक समुदाय:
* **सिख:** औरंगज़ेब के शासनकाल में सिख गुरुओं के साथ संबंध बिगड़े। गुरु तेग बहादुर का 1675 में दिल्ली में सिर कलम कर दिया गया, जिसके कारणों में धार्मिक असहिष्णुता और सिखों की बढ़ती सैन्य शक्ति दोनों शामिल थे। इसने सिख समुदाय को औरंगज़ेब के विरोध में खड़ा कर दिया।
* **शिया:** औरंगज़ेब एक सुन्नी शासक थे और उन्होंने शिया मत के प्रति कठोर रुख अपनाया। उन्होंने शिया रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगाए और शिया राज्य गोलकुंडा को भी जीत लिया।
अध्याय 5: सैन्य अभियान और साम्राज्य का विस्तार
औरंगज़ेब का शासनकाल लगातार सैन्य अभियानों से भरा रहा। उन्होंने मुगल साम्राज्य का दक्षिण में अभूतपूर्व विस्तार किया, लेकिन इसकी कीमत साम्राज्य की आर्थिक और प्रशासनिक सेहत को चुकानी पड़ी।
1. उत्तर भारत में विद्रोहों का दमन:
* **जाट विद्रोह (1669-71, 1685-87):** मथुरा-आगरा क्षेत्र के जाट किसानों ने भारी भू-राजस्व और जज़िया के विरोध में विद्रोह किया। औरंगज़ेब ने इन विद्रोहों को क्रूरतापूर्वक कुचला, लेकिन जाट प्रतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
* **सतनामी विद्रोह (1672):** हरियाणा के एक धार्मिक सम्प्रदाय ने करों के विरोध में विद्रोह किया, जिसे दबा दिया गया।
* **बुंदेला विद्रोह:** ओरछा के राजा छत्रसाल ने लंबे समय तक औरंगज़ेब की सेना का मुकाबला किया और अंततः एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।
2. राजपूताना के साथ संबंध (1679-1707):
प्रारंभ में संबंध सहयोगात्मक थे। लेकिन 1679 में जज़िया लागू होने और मारवाड़ के उत्तराधिकार के मुद्दे पर तनाव बढ़ा। औरंगज़ेब ने मारवाड़ (जोधपुर) पर कब्ज़ा कर लिया। इसके जवाब में मेवाड़ (उदयपुर) के राणा राज सिंह ने भी विद्रोह कर दिया। 1681 में एक समझौता हुआ और राजपूत सेना मुगलों के साथ फिर से मिल गई, लेकिन पुराना विश्वास नहीं लौटा।
3. दक्षिण की विजयें: औरंगज़ेब का "दक्कन सूखा":
यह औरंगज़ेब की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि और सबसे बड़ी रणनीतिक भूल दोनों थी।
* **बीजापुर का पतन (1686):** आदिल शाही सल्तनत पर 1686 में आक्रमण करके उसे मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
* **गोलकुंडा का पतन (1687):** कुतुब शाही सल्तनत को भी 1687 में जीत लिया गया। इन विजयों ने मुगल साम्राज्य को अपनी चरम सीमा तक पहुँचा दिया।
* **परिणाम:** ये युद्ध लंबे और खर्चीले थे। उन्होंने मुगल खजाने को खाली कर दिया। दक्षिण को जीतना आसान था, लेकिन उसे नियंत्रित करना मुश्किल साबित हुआ। दूरस्थ प्रशासन और स्थानीय विद्रोहों ने मुगल संसाधनों को बर्बाद कर दिया।
4. मराठों के साथ संघर्ष: अंतहीन युद्ध:
औरंगज़ेब के लिए सबसे बड़ी चुनौती छत्रपति शिवाजी और उनके बाद के मराठे थे।
* **शिवाजी के साथ संबंध:** प्रारंभ में औरंगज़ेब ने शिवाजी को एक छोटा सा जागीरदार समझा। 1666 में शिवाजी आगरा आए, जहाँ उनके साथ अपमानजनक व्यवहार हुआ और वे भाग निकले। इसके बाद शिवाजी ने स्वतंत्र मराठा राज्य की घोषणा कर दी।
* **औरंगज़ेब की रणनीति:** शिवाजी की मृत्यु (1680) के बाद औरंगज़ेब ने खुद दक्षिण चले जाकर मराठा साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रयास किया। उन्होंने मराठा किलों पर कब्ज़ा किया, लेकिन मराठे गुरिल्ला युद्ध (गणिमी कावा) लड़ते रहे।
* **परिणाम:** यह युद्ध 27 साल (1680-1707) तक चला और एक "थकाऊ युद्ध" (War of Attrition) बन गया। औरंगज़ेब की विशाल सेना मराठों की छापामार रणनीति के आगे असहाय साबित हुई। इस युद्ध ने मुगल साम्राज्य को आर्थिक और सैन्य रूप से पूरी तरह निचोड़ दिया।
5. उत्तर-पूर्व और अन्य अभियान:
असम (अहोम) के खिलाफ अभियान सफल नहीं रहे। सतलुज क्षेत्र में सिखों के साथ भी झड़पें हुईं।
अध्याय 6: अर्थव्यवस्था, कला, स्थापत्य एवं संस्कृति
1. अर्थव्यवस्था:
औरंगज़ेब के शासनकाल के पहले भाग में अर्थव्यवस्था स्थिर थी। व्यापार फल-फूल रहा था, विशेषकर समुद्री व्यापार यूरोपीय कंपनियों के साथ। हालाँकि, दक्षिण के लंबे युद्धों ने खजाने को खाली कर दिया। करों में वृद्धि हुई, लेकिन युद्ध खर्च के आगे वह नाकाफी थे। किसानों पर बोझ बढ़ा और कई क्षेत्रों में आर्थिक तंगी फैली। फिर भी, साम्राज्य विशाल था और कुल मिलाकर आर्थिक गतिविधियाँ जारी रहीं।
2. स्थापत्य कला:
औरंगज़ेब को कला का संरक्षक नहीं माना जाता, लेकिन उन्होंने भी कई महत्वपूर्ण इमारतें बनवाईं, हालाँकि वे अपने पूर्वजों की भव्यता से कम थीं।
* **बादशाही मस्जिद, लाहौर (1673):** यह औरंगज़ेब की सबसे भव्य इमारत है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह मस्जिद भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है।
* **मोती मस्जिद, दिल्ली (1659-60):** लाल किले के भीतर सफेद संगमरमर से निर्मित एक छोटी सी खूबसूरत मस्जिद।
* **बीबी का मकबरा, औरंगाबाद (1660-61):** इसे "दक्कन का ताजमहल" कहा जाता है। यह औरंगज़ेब की पत्नी दिलरस बानो बेगम (रबिया-उद-दौरानी) का मकबरा है।
* **ज़ीनत-उल-मस्जिद, दिल्ली:** औरंगज़ेब की बेटी ज़ीनत-उन-निसा ने बनवाई।
* **गोलकुंडा किले में मस्जिदें।**
इमारतों की शैली में सादगी और कार्यात्मकता देखी जा सकती है, जो औरंगज़ेब के व्यक्तित्व के अनुरूप थी।
3. संगीत एवं चित्रकला:
औरंगज़ेब ने दरबार में संगीतकारों और चित्रकारों को बर्खास्त कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि ये इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। हालाँकि, संगीत पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ; यह दरबार के बाहर जनसाधारण में जीवित रहा। चित्रकला भी रुकी नहीं, बल्कि दरबारी संरक्षण के अभाव में यह प्रांतीय केंद्रों में विकसित हुई।
4. साहित्य एवं शिक्षा:
फारसी साहित्य का विकास जारी रहा। औरंगज़ेब स्वयं एक विद्वान थे और उन्होंने धार्मिक ग्रंथों की रचना व संकलन को प्रोत्साहन दिया। "फतवा-ए-आलमगीरी" का संकलन उनके काल की एक महान साहित्यिक-धार्मिक उपलब्धि थी। उन्होंने मकतब और मदरसों (स्कूल और कॉलेज) को भी सहायता दी।
अध्याय 7: अंतिम वर्ष, मृत्यु और विरासत (1700-1707)
अपने जीवन के अंतिम दशक में औरंगज़ेब एक थके हुए, निराश और चिंतित शासक थे। वह स्वयं दक्षिण में ही रहे और उत्तर की स्थिति से अनभिज्ञ रहे।
* **साम्राज्य की समस्याएँ:** खजाना खाली हो चुका था। सैनिकों का वेतन न मिलने के कारण असंतोष था। प्रशासनिक ढाँचा शिथिल पड़ रहा था। मराठे, सिख, जाट और बुंदेले लगातार विद्रोह कर रहे थे।
* **पारिवारिक कलह:** औरंगज़ेब को अपने बेटों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष का भय सताता था। उसने अपने बेटे मुअज्जम (बादशाह बहादुर शाह प्रथम) को लिखे एक पत्र में अपनी निराशा और पश्चाताप व्यक्त किया: *"मैंने जो कुछ किया है, वह सब व्यर्थ गया... मैं आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल दुःख और अपमान छोड़कर जा रहा हूँ।"*
* **मृत्यु:** 3 मार्च, 1707 को 88 वर्ष की अवस्था में अहमदनगर के निकट खुलदाबाद में औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई। अपनी इच्छानुसार, उन्हें बहुत ही सादे ढंग से, खुले आसमान के नीचे दफनाया गया। उनकी कब्र पर एक साधारण संगमरमर की स्लैब रखी गई, जो उनकी सादगी का प्रतीक है।
* **उत्तराधिकार:** उनकी मृत्यु के बाद पुत्रों के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। अंततः बहादुर शाह प्रथम सिंहासन पर बैठा, लेकिन मुगल साम्राज्य का तेजी से पतन शुरू हो गया। केवल 50 वर्षों के भीतर, मुगल साम्राज्य एक स्थानीय शक्ति तक सिमट गया।
अध्याय 8: ऐतिहासिक मूल्यांकन और निष्कर्ष
औरंगज़ेब आलमगीर का ऐतिहासिक मूल्यांकन हमेशा से विवादों में घिरा रहा है।
* **ब्रिटिश व औपनिवेशिक दृष्टिकोण:** ब्रिटिश इतिहासकारों ने अक्सर औरंगज़ेब को एक कट्टर, असहिष्णु और क्रूर शासक के रूप में चित्रित किया, ताकि यह साबित हो सके कि भारत स्वयं शासन करने योग्य नहीं था। सर जदुनाथ सरकार जैसे इतिहासकारों ने भी (हालाँकि विस्तृत शोध के बावजूद) अक्सर उनकी आलोचना की।
* **राष्ट्रवादी हिंदू दृष्टिकोण:** कई राष्ट्रवादी हिंदू विचारकों ने औरंगज़ेब को हिंदू विरोधी और मंदिर-तोड़ने वाला बताकर उनकी कठोर आलोचना की। वी. डी. सावरकर ने भी उन्हें "धर्मान्ध" कहा।
* **मध्ययुगीन मुस्लिम दृष्टिकोण:** कुछ मुस्लिम लेखकों ने उन्हें एक आदर्श इस्लामी शासक के रूप में प्रस्तुत किया, जो शरिया को लागू करना चाहता था।
* **आधुनिक, संतुलित दृष्टिकोण:** आधुनिक इतिहासकार जैसे सतीश चंद्र, इरफान हबीब, ऑड्रे ट्रशके, अथर अली आदि ने औरंगज़ेब के व्यक्तित्व और नीतियों का एक बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत किया है। वे मानते हैं कि औरंगज़ेब को केवल धार्मिक नीतियों के आधार पर आँकना ठीक नहीं। उनकी नीतियों के पीछे राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक कारण भी थे।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि:
1. **एक कुशल प्रशासक:** औरंगज़ेब एक अत्यंत मेहनती, अनुशासित और न्याय के प्रति समर्पित शासक थे। उन्होंने एक विशाल साम्राज्य को कुशलता से चलाया।
2. **एक सफल सैन्य रणनीतिकार:** उन्होंने मुगल साम्राज्य को उसकी अधिकतम भौगोलिक सीमा तक पहुँचाया।
3. **धार्मिक नीतियों की जटिलता:** उनकी धार्मिक नीतियाँ (जज़िया, मंदिर विध्वंस) ने साम्राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया और व्यापक असंतोष पैदा किया। हालाँकि, यह नीतियाँ पूर्णतः धार्मिक न होकर राजनीतिक उद्देश्यों से भी प्रेरित थीं।
4. **दक्षिण की नीति: एक रणनीतिक भूल:** दक्कन के लंबे और खर्चीले युद्धों ने मुगल साम्राज्य की कमर तोड़ दी। यह औरंगज़ेब की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी।
5. **विरासत:** औरंगज़ेब का शासन मुगल साम्राज्य के चरमोत्कर्ष और उसके पतन की शुरुआत दोनों का प्रतीक है। उनके बाद साम्राज्य कभी भी पुनः अपनी पुरानी शक्ति प्राप्त नहीं कर सका।
औरंगज़ेब आलमगीर एक ऐसी ऐतिहासिक विभूति हैं जिन्हें "अच्छा" या "बुरा" के सरल खानों में नहीं रखा जा सकता। वे अपने समय, अपनी आस्था और अपनी राजनीतिक चुनौतियों की उपज थे। उनका अध्ययन हमें 17वीं सदी के भारत की जटिलताओं, साम्राज्यों के उत्थान-पतन के कारणों और इतिहास की बहुआयामी प्रकृति को समझने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। औरंगज़ेब का जीवन और शासन यह सबक देता है कि केवल सैन्य शक्ति और कठोर नीतियों से साम्राज्य स्थायी नहीं होता; उसे सामाजिक समावेशन, आर्थिक सुदृढ़ता और सांस्कृतिक सहिष्णुता की नींव पर खड़ा करना होता है।
(नोट: यह निबंध विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, पुस्तकों और शोधपत्रों के आधार पर एक विस्तृत और संतुलित विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास है, इसमें आगे रिसर्च और असहमति की पूरी गुंजाइश है,।)

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