सुल्तान टीपू और धार्मिक सहनशीलता | Tipu Sultan & Religious tolerance
फतह अली खान कुरैशी उर्फ़ सुल्तान टीपू (1213 AH = 1799 AD) और धार्मिक सहनशीलता
भारत की शांतिपूर्ण धरती पर स्वतंत्रता की हवा में सांस लेते हुए, विदेशी शासन (अंग्रेजी राज) की चर्चा होती रहती है और देशभक्तों व शहीदों के बलिदान की याद दिलाने व प्रशंसा करने वाली सभाएं जुटती रहती हैं। ये सभाएं तब तक पूरी नहीं हो सकतीं जब तक टीपू सुल्तान का जिक्र न हो।
यह सच है कि सुल्तान आजादी की लड़ाई के अगुआ थे, लेकिन इसके अलावा भी उनमें बहुत सी ऐसी खूबियाँ थीं जिनसे लोग अनजान हैं। यही कारण है कि बहुत से लोग सुल्तान को एक संकीर्ण सोच वाला और हिंदू-विरोधी जालिम शासक के रूप में पेश करने की नाकाम कोशिश करते हैं, जबकि हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
गलतफहमियाँ तो अंग्रेज इतिहासकारों ने गढ़ी हुई और झूठी बातें लिखकर फैलाई थीं। उनके झूठ का अंदाजा लगाने के लिए सिर्फ यह एक उदाहरण काफी होगा: एक अंग्रेज इतिहासकार ने लिखा है कि टीपू सुल्तान ने सिर्फ 'कोरंग' शहर में सत्तर हजार लोगों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया था, जबकि टीपू के जमाने में 'कोरंग' इलाके की आबादी सिर्फ पच्चीस से तीस हजार थी।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ 432, लेखक: मौलाना इलियास साहब नदवी भटकली)
मंदिरों पर अनुग्रह
टीपू सुल्तान ने मस्जिदों और मंदिरों के बीच कभी कोई भेदभाव नहीं रखा। जिस तरह मस्जिदों पर सुल्तान की नजर रही, उसी तरह मंदिरों पर भी उनकी कृपा-दृष्टि रही, जिसका अंदाजा नीचे दी गई कुछ मिसालों से लगाया जा सकता है:
- तालुका नंजनगढ़ (Nanjangarh) के कलाले नाम के गाँव में स्थित लक्ष्मीकांत मंदिर में चांदी के चार कटोरे, एक प्लेट और एक अगरबत्तीदान आज भी देखा जा सकता है, जो टीपू सुल्तान शहीद ने इस मंदिर को भेंट के रूप में दिए थे।
- खुद श्रीरंगपट्टनम (Srirangapatna) के रंगनाथ मंदिर को सुल्तान ने एक कपूरदान और चांदी के सात कटोरे दिए थे और ये चीजें आज तक इस मंदिर में मौजूद हैं।
- उक्त शहर के एक और मंदिर सरकेश्वर को एक जड़ाऊ कटोरा – जिसके निचले हिस्से में पांच कीमती जवाहरात जड़े हुए थे – अता किया और नारायण स्वामी मंदिर को कीमती जवाहरातों से सजे हुए बहुत से बर्तन, एक नगाड़ा और बारह हाथी भेंट किए थे।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ: 438)
मंदिरों की रक्षा / देखभाल
सुल्तान ने मंदिरों पर सिर्फ खजाना लुटाकर ही बात खत्म नहीं की, बल्कि कई मंदिरों की मुश्किल वक्त में हिफाजत भी की है।
- डिंडीगल (Dindigul) तालुका पर हमला करते हुए सुल्तान ने इसके पिछले हिस्से से गोलाबारी करवाई थी, जिसका मकसद सिर्फ यह था कि राजा का वह मंदिर हमलों की जद में न आए जो किले के आगे वाले हिस्से में स्थित था।
- मालाबार (Malabar) में गुरुवायूर पर कब्जे के दौरान वहां के एक मंदिर को आग के हवाले करने की कोशिश करने वाले कुछ मुस्लिम सिपाहियों को सुल्तान ने सजाएं भी दिलवाईं और उसी वक्त मंदिर की मरम्मत भी करवाई।
- कांचीपुरम (Kanjivaram) के उस मंदिर की तामीर के लिए (जिसकी बुनियाद 1780 में सुल्तान हैदर अली ने रखी थी, मगर तामीर न हो सकी थी) सुल्तान ने दस हजार रुपये पेश करने के साथ-साथ इस मौके पर होने वाली आतिशबाजी के खर्चे भी खुद उठाए थे।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ: 438)
मंदिरों और स्वामियों का सम्मान
जब रघुनाथ राव (Raghunathrao) की कमान में मराठा घुसपैठियों और फसादियों ने श्रृंगेरी के एक मंदिर पर हमला किया, बेशकीमती माल लूटकर ले गए और सरस्वती देवी नाम की मूर्ति को बाहर फेंक दिया, जिसके नतीजे में मंदिर के स्वामी और मुतवल्ली शंकर गुरुवाचार्य भागकर शहर कारकल में पनाहगजीन हुए और सुल्तान से हालात की शिकायत की, तो सुल्तान ने जवाब में एक खत स्वामी के नाम भेजा, जिसमें आपने इतने अदब के साथ स्वामी को तसल्ली दी कि खिलाफ-ए-मामूल 'गुरुजी' के नाम को अपने नाम पर मुकद्दम किया और इसी पर बस नहीं, बल्कि उन्हें अपने कब्जे वाले दिहातों में से कोई भी चीज लेने का इख्तियार दिया, निज़ इस इलाके के गवर्नर से दो सौ अशरफियां माल के साथ दिलवाईं और सरस्वती देवी को इज्जत के साथ उसकी जगह नस्ब करवाकर इस तकरीब के मौके पर एक हजार फकीरों को खाना खिलवाया।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ: 435)
हिंदू अधिकारी उच्च पदों पर
सुल्तान ने हिंदुओं को सिर्फ दूर से ही नहीं नवाजा, बल्कि उन्हें बड़े-बड़े ओहदों पर भी फाइज कर रखा था।
- सल्तनत-ए-खुदादाद का वजीर-ए-खजाना हिंदू ब्राह्मण 'पूर्णिया' था। यही 'पूर्णिया' बा-एतबार-ए-इख्तियारात वजीर-ए-आजम मीर सादिक के बाद सुल्तान का नायब-ए-दोम भी था।
- सुल्तान का जाती मुंशी और मुतमद-ए-खास 'लाला मेहताब राय सबकत' नाम का एक हिंदू ब्राह्मण था, जो मैदान-ए-जंग में भी शाही कैंप में रहता था और आखिर तक सुल्तान का वफादार रहा।
- मैसूर की फौज का अफसर-ए-आला हरी सिंह था, जिसका भाई भी बावजूद हिंदू होने के हुकूमत का एक बड़ा अहलकार था। कोर्ग की फौज का अफसर-ए-आला एक ब्राह्मण था। इसके अलावा तीन हजार की एक फौज सरदार शिवाजी की कमान में रहती थी। इसी तरह और भी कई मनासिब-ए-आलिया पर गैर-मुसलमानों को फाइज कर रखा था।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ: 434)
अधिकारों में समानता
सुल्तान टीपू ने जिस तरह इबादतगाहों में बराबरी और मसावात का मामला किया, उसी तरह इंसानी हकूक में भी बिला तफरीक हिंदू-ओ-मुस्लिम के मजहबी रवादारी की आला मिसाल कायम की। जहां उन्होंने कृष्णाराव और उसके भाइयों को गद्दारी की सजा में तख्ते-दार पर लटकाया, वहीं मुहम्मद कासिम और उस्मान खान कश्मीरी को भी मौत के घाट उतारा। जहां सुल्तान ने ईसाई गद्दारों और नमक-हरामों के पेशवा और कायदीन को मौत की सजा दी, वहीं उन मुस्लिम औरतों को भी कत्ल किया जिन्होंने अंग्रेज सिपाहियों के साथ बदकारी की थी।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ: 433)
- अहल-ए-सुनत व जमात से अकाइद में बुनियादी फर्क की बिना पर महदवी फिरके को सुल्तान गैर-मुस्लिम ही गुमान करते थे, निज़ यह लोग सल्तनत-ए-खुदादाद के लिए आस्तीन के सांप थे। इनमें से भी बहुत से लोगों को बड़े-बड़े ओहदों पर फाइज कर रखा था। जब उनकी अंग्रेजों की खुफिया हिमायत पर एक मुद्दत-ए-दराज गुजर गई और ज़िक्र-बिल-जहर का वह खास गैर-शरई तरीका – जिसके यह लोग कायल थे – पूरी-पूरी रात आस-पास के लोगों की तकलीफ का बाइस बनने लगा और बर-मला हुक्म-ए-उदूलियां करने लगे, तो सुल्तान ने मजकूरा जुर्मों में हद-ए-तजावुज की वजह से उनको जला-वतन कर दिया।
ईसाइयों के साथ सुल्तान का सुलूक
ईसाइयों के साथ भी सुल्तान का रवैया कुछ मुख्तलिफ न था। सुल्तान ने कई फ्रांसिसी ईसाइयों को अपनी सल्तनत में ओहदे सुपुर्द कर रखे थे। आर्मीनिया के ईसाई ताजिरों को भी अपने मुल्क में आकर तिजारत करने की इजाजत ही नहीं दी, बल्कि उनकी माली पुश्त-पनाही भी की। गोवा से तारिकीन-ए-वतन ईसाइयों को दोबारा अपनी सल्तनत में लाकर बसाया।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ: 445)
रियाया के दिल में सुल्तान की अकीदत व मुहब्बत
रियाया में सुल्तान टीपू की अकीदत इस कदर थी कि हिंदू मजहब के दो फिरकों वाडगलाई और टंकलाई के दरमियान इख्तिलाफ होने पर खुद हिंदुओं ने सुल्तान को अपना हकम और सलिस बनाया था। भला अगर सुल्तान जालिम और हिंदू-दुश्मन होते तो यह सूरत-ए-हाल क्यूंकर मुमकिन होती?
सुल्तान की मजहबी रवादारी ही तो थी जिसने रियाया के सीनों में अकीदत व मुहब्बत के वह शोले फरोजां किए थे, जिन्हें देख कर अंग्रेज भी शशदर थे। सुल्तान ने जिस जगह अपनी जान जाँ-आफरीन के सुपुर्द की, उसी जगह सुल्तान के सैकड़ों फिदाईन की लाशें पड़ी हुई थीं, जिनमें औरतें भी थीं और जवान लड़कियां भी। जब सुल्तान का जनाजा उठाया जाने लगा, तो राह में हिंदू औरतें मातम करते हुए अपने सिरों पर मिट्टी डाल रही थीं।
(सीरत-ए-टीपू सुल्तान शहीद, पृष्ठ: 443)
इसी लिए जफर अली खान ने कहा था:
"कुव्वत-ए-बाजू-ए-इस्लाम थी उसकी, सौलत उसकी
दौलत के दुआगोओं में शामिल थे हुनूद"
क़ारिआन-ए-किराम!!!
सुल्तान की मजहबी रवादारी और बिला तफरीक-ए-मजहब रियाया से हुस्न-ए-सुलूक मुलाहिजा फरमाइए और दूसरी तरफ हिंदू फिरकापरस्तों के मुंह से निकला हुआ जहर देखिए। तारीख के मसख करने और उसे मिटाने की जिंदा मिसाल आपको वाजेह तौर पर समझ में आ जाएगी। जो लोग तहमुल-मिजाजी और बर्दाश्त की दौलत से महरूम हैं और जो तअस्सुब के नापाक नाले के गंदे कीड़े हैं, जो सांप-ओ-बिच्छू की तरह हमेशा जहर उगलते रहते हैं, वह कह रहे हैं कि सुल्तान हिंदू-कुश और मुतअस्सिब जालिम हाकिम था!!!
काश एक नजर अपने दामन पर भी डाल ली होती!
"दामन तो ज़रा देख, ज़रा बंद-ए-क़बा देख"
अफसोस इस पर भी है कि सरजमीन-ए-हिंद के इस अजीम सपूत के हालात-ए-जिंदगी और उसके काबिल-ए-रश्क करनामे बाशिंदगान-ए-मुल्क तक सही मानी में पहुंचाए नहीं गए हैं, वरना मुमकिन न था कि सुल्तान को मुतअस्सिब और हिंदू-दुश्मन जालिम हाकिम कहा जाता। गौर करने से मालूम होता है कि मजहबी रवादारी, गैर-मुसलमानों की खुशी-ओ-गम में शरीक होने और उनके मजहबी जज्बात का ख्याल रखने में सुल्तान इस कदर आगे निकल गए थे कि बाज मौकात पर फिकही एतबार से इस पर बहस भी की जा सकती है।
अलमिया यह है कि खुद मुसलमानान-ए-हिंद अपने सलातिन-ओ-हुक्मरानों के करनामों और उनकी अदल-परवरी की दास्तानों से नावाकिफ हैं। अगर टीपू सुल्तान के मसले में संजीदगी इख्तियार न की गई और उसे पढ़ा और पढ़ाया न गया, तो वह दिन दूर नहीं जब टीपू सुल्तान जैसा आदिल हुक्मरान भी 'महमूद गजनवी' और 'औरंगजेब' की तरह कटघरे में खड़ा होगा और मुसलमान-ए-हिंद वकील-ए-सफाई बन कर वजाहात दे रहे होंगे। लेकिन अफसोस!!! तब पानी सर से ऊपर हो चुका होगा।

No comments: